09 सितंबर 2009

पैसे देकर डिग्री लेंगे और पैसे लेकर खबरें छापेंगे

अनुराग शुक्ला

सुना है पूरब के आक्सफोर्ड के जन संचार विभाग के उन कुर्सियों पर बैठ कर पढने वाले स्टूडेंट शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ इलाहाबाद यूनिवर्सिटी प्रशासन के खिलाफ लडाई लड रहें हैं जिन पर बैठ कर कभी हम पढा करते थे मेरठ में बैठ कर भी पोर्टल और ब्लाग पर पढा है कि केंद्रीय यूनिवर्सिटी बन जाने के बाद भी कोई प्राक्टर साहब स्टूडेंट को मुर्गा बना रहें हैं दोनों खबरें सुनी और एक स्वनाम धन्य तथाकथित अकादमिक रूप से दक्ष वीसी के वक्त में ऐसा हो रहा है अनुशासन के नाम पर तानाशाही की जा रही है और पढा लिखा वाइस चांसलर कह रहा है कि खबरनवीस की क्या हैसियत जो मुझसे बात करें सुना है और कभी कभी देखा भी है कि अकादमिक रूप से बेहद जानकार ये आदमी पूरे शहर का फीता काट सेलीब्रेटी बन चुका है अपने से सवाल पूछने से ये साहब इतने नाराज हुए कि जनसत्ता के संवदादाता राघवेंद्र के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी अब यूनिवर्सिटी में पच्चीस साल पुराने जन संचार विभाग होते हुए भी ये साहब जगह जगह यूनिवर्सिटी में अखबार के अखाडे बाज पैदा करने की दुकाने खुलवा रहे हैं

जन संचार विभाग में पढाने वाले सुनील उमराव ने जब शिक्षा की इस दुकानदारी के खिलाफ आवाज उठाई सैंकडो स्टूडेंटस ने कैम्पस में इस डिग्री खरीद प्रथा के खिलाफ झंडा बुलंद किया तो सुनील को नोटिस भेजी गई है कि आप अराजकता का माहौल फैला रहे हैं हम लोग भी राजीनीति विज्ञान के स्टूडेंट रहे हैं और अराजकता और तानाशाही का मतलब बखूबी समझते हैं प्लानिंग कमीशन की भी शोभा बढा चुके वाइस चांसलर साहब जो कुछ कर रहे हैं वो तानाशाही और अराजकता देानों पर फिट बैठता है रही अराजकता और सुनील उमराव की बात तो सुनील सर का स्टूडेंट रहा हूं सिर्फ मैं नहीं बल्कि मुझसे पहले और बाद में उनके स्टूडेंट रहे लोग अगर ईमानदारी से बोलेंगे तो हर कोई कहेगा कि सुनील सर कम से कम अराजक नहीं हो सकते और संस्थागत बदलावों में यकीन रखते हैं मीडिया के नाम पर खोली जा रही दुकानों में किसी फूं फां टाइप सेलीब्रटी को बुलवाकर फीताकाट जर्नलिज्म नहीं पढाते हैं कि आप ने साहब सबसे तेज चैनल पर बोलने वाली किसी खूबसूरत एंकर के दर्शन कर लिए और आप बन गए जर्नलिस्ट

खैर बात को अब शिक्षा के निजीकरण पर लौटना चाहिए यूनिवर्सिटी अब केंद्रीय हो चुकी है अब उसके पास केंद्र सरकार से मिलना वाला अकूत पैसा है तब यूनिवर्सिटी में अखबारनवीस पैदा करने वाले फ्रेंचाइजी खोलने की क्या जरूरत आन पडी है अगर ज्यादा व्यापक पैमाने पर बात की जाए तो प्रोफेशनल स्टीजड जैसे छलावे बंद किए जाएं और जनसंचार की पढाई को कम से अलग रूप में देखना ही पडेगा अगर मीडिया को चैथा खंभा कहना का नाटक अभी कुछ हद तक जारी है तो कम से कुछ ऐसे लोग हैं जो मीडिया की जन पक्षरधरता बरकरार रखने की लडाई लड रहे हैं ये लडाई सिर्फ सुनील उमराव की लडाई नहीं है आईआईएमसी से पढे राजीव और जनसंचार विभाग के स्टूडेंट रह चुके शहनवाज इस जनपक्षधरता की लडाई लड रहे हैं मुझे नहीं पता कि अपने अकादमिक जगत में मस्त वाइस चांसलर इनकी उपलब्ध्यिों को कितना जानते हैं लेकिन शहनवाज और राजीव ने आतंकवाद के मसले पर जितना बढिया काम किया है उसे अगर वीसी साहब जानते होंगे तो उन्हें जरूर गर्व होगा कि ये लोग कभी इस यूनिवर्सिटी से जुडे रहे हैं और आज भी यूनिवर्सिटी इनका कार्य स्थल है इनके काम से व्यक्तिगत रूप से वकिफ रहा हूं और दावे से कह सकता हूं कि ये उन्हीं संस्कारों की देन है जिनकी लडाई सुनील आज यूनिवर्सिटी में लड रहे हैं ये जन पक्षधरता और डेमोक्रेटिक वैल्यूज के संस्कार थे कि शहनवाज भाई ने एक प्राक्टर की गुंडागर्दी के खिलाफ उसके आॅफिस में घुसकर मुंह काला किया था ये शहनवाज के संस्कार थे कि गुंडागर्दी किसी प्राक्टर की ही क्यूं न हो बर्दाशत नहीं की जाएगी राजीव ने भी सरायमीर और आजमगढ की लडाई में कितने पापड बेले ये शायद विकास की टिकल डाउन थ्योरी में यकीन रखने वाला ब्यूरोक्रटिक किस्म का अकादमिक न समझ पाए लेकिन आप के न समझने से इनकी लडाई कमजोर नहंी पड सकती है हां अगर आप समझ जाए तो शायद दो चार लाख रूपए देकर डिग्री खरीदने वाले हम्टी डम्टी छाप स्टूडेंट के अलावा ऐस भी कुछ लोग पढाई लिखाई की दुनिया में कुछ कर सकते हैं जिनके बारे में अपना मोर्चा में काशीनाथ सिंह ने लिखा है मुझे पता है आप अंग्रेजी भाषी हैं और अपना मोर्चा नहीं पढा होगा आप कंपनी बाग के उन फूलों के बारे में नहंी जानेते होंगे जो ब्यूरोक्रसी के ढांचे में अपनी जगह बनाने के लिए इतने तंग कमरों में रहते हैं कि दोपहर की धूप में भी उन तक रोशनी नहीं पहुंचती है काश आप अगर उनके बारे में जानते होते तो दो दो चार लाख रूपए लेकर सपनों की बिक्री नहीं करते एजूकेशन हिंदुस्तान में इंस्पििरेशनल वैल्यू रखती है डिग्री बहुतों के लिए सपना ही है आप पढे लिखे समझदार आदमी हैं कम से कम डिग्रियों को कारोबार मत करिए दो चार लाख में डिग्री बेंचना उस जालसाजी से अलग नहीं है जिसमें नकली डिग्रियां बेंची जाती हैं मीडिया की पढाई बीटेक और मैनेजमेंट जैसी पढाई भी नहीं है अगर ये मान भी लिया जाए कि अखबार प्रोडक्ट है तो भी अखबार कम से कम ऐसे प्रोडक्ट है जिसकी कुछ सामाजिक जिम्मेदारयां हैं इसे अखबार मालिक, कलमनवीस से लेकर अखबारनवीस तैयार करने वालों, सबको समझना चाहिए आप अगर सेल्फ फाइनेंस के नाम पर पैसे देकर खबरनवीस तैयार करने के धंधे को बढावा दे रहे हैं तो आप जाने अनजाने या यूं कहिए कि जान बूझ कर उस परम्परा के भी पक्षधर बन रहे हैं जो पैसे लेकर खबरें छाप रहे हैं जो पैसे देकर खबरनवीस बन रहे हैं वे पैसे लेकर खबर छापेंगे ही पूंजी के संस्कार आखिरकार ऐसी ही दिशा में जाते हैं आज जिस विभाग के स्टूडेंट बहुत सालों बाद हक की लडाई के लिए सुनील सर के साथ सडकों पर उतरे हैं उसकी जय हो
अनर्तमन के समर्थन के साथ.

(अनुराग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय पत्रकारिता व जनसंचार विभाग के पुरा छात्र व पत्रकार हैं.)

साथियों,
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1 टिप्पणी:

Alok ने कहा…

I am an alumni of Allahabad University. I was one year senior to Sunil Umrao in Sir G N Jha Hostel. Recently I happened to be at the Hostel. The way things are going there I have no doubts whatsoever that the University and all other institutions affiliated to it will be doomed in the next couple of years thanks to its faculty. I was under an impression that the present VC had the will and capabilities to improve the affairs of the Univ. If Sunil Umrao is forced to agitate I am sure things are really hopeless at the end of the authorities.

Alok

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