06 सितंबर 2009

आन्दोलन की कहानी, तस्वीरों की जुबानी

पत्रकारिता की शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ इलाहाबाद विश्वविद्यालय में संघर्षरत छात्र और शिक्षक.






तस्वीरें: इलाहाबाद विश्वविद्यालय पत्रकारिता विभाग के छात्रों के सौजन्य से

4 टिप्‍पणियां:

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) ने कहा…

युवा साथियों हम आपके साथ हैं। भड़ास परिवार आपके साथ है। निजीकरण करके सरकार में बैठे लालाजी किस्म के लालची वणिक लोग आपके खून को चूसने के पाइपों का जाल बिछा रहे हैं वरना क्या सरकार में साहस नहीं है या संसाधन नहीं है कि इस संकाय को चला सके??? अवश्य है लेकिन ये आप लोगों में धार आने से पहले ही कुंठित करने की साजिश का शुरुआती हिस्सा है।
जागो रे.... भाई-बहनों जागो रे.....

antaryatri ने कहा…

virodh aur janadesh.in par aap ki rapat dekhi .hum bhi sath hai.

विजय प्रताप ने कहा…

शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ इलाहबाद विश्वविद्यालय के संघर्षरत छात्र व शिक्षक समुदाय के साथ आप सभी का सहयोग प्रशंसनीय और जरुरी है.
शुक्रिया !

www.prabhatphotos.com ने कहा…

शिक्षा की दुकानदारी करने वाले पहले ही क्या कम हैं कि विश्वविद्यालयों को दुकान खोलने की ज़रूरत पड़ने लगी है. यह भी कम शर्मनाक नहीं है कि सेमिनार और सार्वजनिक मंचों पर लच्छेदार बातें करने वाले टीचर्स और वीसी कैम्पस में इस तरह की दुकानों के हिमायती बनकर खड़े हैं. इनको विद्या दान शोभा देता है न कि विद्या की दुकानदारी. इस तरह के विरोध की ज़रुरत ही न पड़ती अगर इन्तेजामियां के लोग अपनी ज़िम्मेदारी समझते और घटिया किस्म की हरकतों से बाज़ आते. कोई बात नहीं अगर उनको ये बातें समझाने और याद दिलाने का बीड़ा स्टूडेंट्स ने उठाया- कोई तो उठा. विरोध को वे अपनी हत्तक मान सकते हैं दोस्तों मगर ये आपका दायित्व बोध है जो आपसे यह सब करा रहा है. उन्हें नहीं है शऊर तो माफ़ कीजिए. फैज़ की यह नज़्म सुनिए और उन्हें भी सुनाइए-

http://www.youtube.com/watch?v=y_EmyqTTHIY&feature=PlayList&p=003B3327C58B1551&playnext=1&playnext_from=PL&index=30

अपना समय