25 अगस्त 2008

राजगुरु की याद में........


भगत सिंह के साथ अक्सर जो दो नाम और आते हैं उनमे राजगुरु और सुखदेव जैसे क्रांतिकारी भी हैं। यह साल इसमे से एक राजगुरु की जयंती का सौवां साल है, लेकिन न तो हमारे हुक्मरानों को इसका ख्याल है और न ही अपने को भगत सिंह राजगुरु सुखदेव का वारिस बताने वाली ताकतों को. राजगुरु के जीवन पर बीबीसी की एक रिपोर्ट



भारतीय स्वाधीनता संग्राम में तीन नाम अक्सर एक साथ लिए जाते हैं भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव लेकिन इतिहास में सुखदेव और राजगुरु को शायद वो स्थान नहीं मिल सका जो भगत सिंह को हासिल है.
यही कारण है कि पिछले साल जहां भगत सिंह की जन्म शताब्दी पूरे देश में धूमधाम से मनाई गई वहीं यह साल राजगुरु की जन्म सदी का है लेकिन सिर्फ उनके गांव को छोड़ कर कहीं भी कोई समारोह शायद ही हुआ हो.
राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र में पुणे ज़िले के खेड़ा गांव में हुआ था जिसका नाम अब राजगुरूनगर हो गया है.
भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी.
भगत सिंह पूरे क्रांतिकारी आंदोलन के एक तरह से दिशा निर्धारक थे जबकि राजगुरू की भूमिका समझिए एक शूटर की थी जो सबसे कठिन काम करने की कोशिश करता हो. शायद यही कारण था कि उन पर लोगों का ध्यान नहीं गया

राजगुरु की जन्म सदी के अवसर पर सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर समारोह भले ही न हुए हों लेकिन उन पर एक किताब प्रकाशित हो रही है जिसके लेखक हैं अनिल वर्मा.
दिलचस्पी कैसे हुई
अनिल वर्मा पेशे से न्यायाधीश हैं और मध्य प्रदेश में कार्यरत हैं. लेकिन राजगुरु में उनकी दिलचस्पी कैसे हुई.
वर्मा कहते हैं, "मैं खेल के मुद्दों पर लिखता था लेकिन मेरे पिताजी चंद्रशेखर आज़ाद के साथ स्वतंत्रता सेनानी रहे थे इसलिए मेरी रुचि थी. मुझे पता था कि राजगुरु के बारे में लोगों की जानकारी कम है इसलिए मैंने सोचा क्यों न उनके बारे में लिखा जाए".
अनिल इस तथ्य से इंकार नहीं करते कि राजगुरु को भगत सिंह की तरह स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में ऊंचा दर्जा हासिल नहीं हुआ लेकिन वो कहते हैं कि धीरे धीरे लोगों को राजगुरू के बारे में अधिक जानकारी मिलेगी.
राजगुरु की अपेक्षा भगत सिंह के अधिक लोकप्रिय होने का वो अलग कारण गिनाते हैं, वो कहते हैं,
पुस्तक के लिए अपने शोध के कारण अनिल राजगुरू के पैतृक गांव महाराष्ट्र के खैरवाड़ी भी गए जहां उन्हें राजगुरु के बचपन की जानकारियां मिलीं. इसके अलावा दिल्ली, बनारस और कई उन स्थानों पर भी वो गए जहां राजगुरू से जुड़ी जानकारियां उन्हें मिल सकती हों.
देशभक्त के रुप में राजगुरु को भी कठिन परीक्षा देनी पड़ी. मात्र 16 साल की उम्र में ही राजगुरु ने घर छोड़ दिया था क्योंकि उनके भाई अंग्रेज सरकार के मुलाज़िम थे औव जब राजगुरु को फांसी हुई तब भी उनके भाई अंग्रेज़ सरकार के नौकर बने रहे.
वर्मा बताते हैं कि इस अंतर्द्वंद्व के बावजूद राजगुरु की देशभक्ति में कोई कमी नहीं आई और वो हमेशा से बलिदान के लिए सबसे आगे रहते.
राजगुरु की लगन
अपने शोध के दौरान मिली जानकारियों में से एक घटना के बारे में अनिल बताते हैं कि राजगुरु की लगन कैसी थी.
वो बताते हैं, "जब भी क्रांतिकारी दल में कोई ऐसा काम आता था जिसमें शहीद होने की संभावना अधिक रहती थी तो राजगुरु सबसे आगे होते. एक बार आगरा में चंद्रशेखर आज़ाद पुलिसिया जुल्म के बारे में बता रहे थे तो राजगुरु ने गर्म लोहे से अपने शरीर पर निशान बना कर देखने की कोशिश की कि वो पुलिस का जुल्म झेल पाएंगे या नहीं".
इस समय राजगुरु के एकमात्र भतीजे जीवित हैं लेकिन उनके परिवार के लोगों को भी लगता है कि राजगुरु की उपेक्षा हुई है.
अब उनकी जन्म शती के अवसर पर भारत सरकार का प्रकाशन विभाग उन पर संभवत पहली किताब ( हिंदी और अंग्रेज़ी में ) प्रकाशित कर रहा है.
वर्मा इस तथ्य से आशान्वित दिखते हैं और कहते हैं कि देर से ही सही लेकिन राजगुरु की सुध तो ली गई है और आने वाले समय में राजगुरु के बारे में लोग और अधिक जानना चाहेंगे।






1 टिप्पणी:

soumya jha ने कहा…

sahi keh rehe hain ,unka naam lekar to kitne hi .yash paa lete hain lekin unki sudh lene vala koi nahi hai.

अपना समय