16 सितंबर 2008

हम आह भी कर दे तो...

स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानी सिमी की स्थापना 1977 में हुई थी और सरकारी दस्तावेज़ों की मानें तो इसका गठन भारत को एक इस्लामिक देश में बदलने के लिए किया गया था. सरकारी सूत्रों के अनुसार अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सिमी को आतंकवादी गतिविधियों से भी कोई एतराज नहीं है. सिमी पर दुनिया भर के इस्लामिक चरमपंथी संगठनों के साथ-साथ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ भी गहरे संबंध के आरोप लगते रहे हैं.
पिछले कुछ सालों से देश में जितनी भी आतंकवादी घटनाएं सामने आई हैं, उन सबमें कहीं ने कहीं प्रतिबंधित संगठन सिमी का नाम जुड़ा रहा है लेकिन सिमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही का आरोप है कि उनके संगठन को बेवजह बदनाम किया जा रहा है. उनका दावा है कि आज तक पूरे देश में सिमी कार्यकर्ताओं पर कोई भी आरोप सही नहीं पाया गया है.
शहर आजमगढ़ से सटे हुए गाँव ककरहटा पहुँचा तो शाहिद अपने यूनानी दवाखाने में एक पाँच साल के निमोनिया से पीड़ित बच्चे को देख रहे थे.जब मैंने अपना परिचय दिया तो शाहिद ने कहा– “ भाई, हमारे बारे में तो बहुत लिखा जाता है, इनके बारे में भी तो लिखिए कि इस बीस किलोमीटर के क्षेत्र में कोई सरकारी दवाखाना नहीं है.”
सिमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शाहिद बद्र फलाही का आरोप है कि मीडिया मुद्दों को गलत तरीके से तुल दे रहा है.
27 सितम्बर 2001 को जब सिमी को प्रतिबन्धित किया गया तो उसी रात शाहिद को गिरफ्तार कर लिया गया था. 7 अप्रैल 2004 को उनके ऊपर लगाए गए आरोपों के सही नहीं पाए जाने पर उन्हें बरी कर दिया गया पर कुछ मुकदमों में वे अभी भी आरोपी हैं. यहां पेश है शाहिद से बातचीत के कुछ अंशः
• आप प्रतिबंधित सिमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं, आज सिमी पर लगातार विभिन्न आतंकी घटनाओं में संलिप्त होने का आरोप लग रहा है ?
आरोप लग रहा है न, सरकार साबित करके दिखाए. पूरे देश में तमाम हो हल्ला, मीडिया ट्रायल और न्यायालय के रवैये के बावजूद आज तक सिमी कार्यकर्ताओं पर कोई भी आरोप सही नहीं पाया गया है.
जबकि इसी मुल्क में अपने आप को देश भक्त कहने वाले संघ परिवार के संगठन और लोग कई न्यायिक फैसलों में सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने व दंगा करवाने के आरोप में सजाएं सुनाए जाने के बावजूद खुलेआम घूमते हैं. "हम आह भी कर दें तो हो जाएं बदनाम, वो कत्ल भी कर दें तो चर्चा नहीं होता. "
• अभी हाल ही में विशेष ट्राइब्यूनल ने सिमी पर तकनीकी कारणों से प्रतिबन्ध हटाया, जिस पर उच्चतम न्यायालय ने तीन हफ्ते के लिए रोक लगाई, इस पर आप क्या सोचते हैं?
इसके पहले जब तीन ट्राइब्यूनल्स ने हमारे खिलाफ फैसला दिया और प्रतिबन्ध को जारी रखा तब हमने ट्राइब्यूनल के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील की थी. लेकिन उन पर सालों से कोई सुनवाई नहीं हुई. जबकि गीता मित्तल के सिमी पर से प्रतिबंध हटाने के फैसले पर उच्चतम न्यायालय ने तत्काल सक्रियता दिखाई.
जहाँ तक तकनीकी कारणों का संदर्भ है तो फैसले तथ्यों के आधार पर होते हैं पर यहाँ मीडिया और सरकार द्वारा जो 'तकनीकी' कारण बताकर प्रचारित किया गया, वो दरअसल पूर्व सूचना थी कि अब तीन हफ्ते के अंदर पूरे देश भर से सिमी के नाम पर गिरफ्तारियाँ कर इस 'तकनीकी फाल्ट' को दूर किया जाय.
• कहा जा रहा है कि आप और सफदर नागौरी में 'हार्ड लाइन बनाम साफ्ट लाइन' की बहस थी, जिसके चलते नागौरी ने इंडियन मुजाहिद्दीन (आई एम) बना लिया?
सिमी का उद्देश्य मुस्लिम नौजवानों में इस्लामिक मूल्यों का प्रचार-प्रसार करना, उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित करना और राजनीतिक तौर पर जागरूक करना था. ये ऐसे काम हैं, जिसमें कोई हार्ड लाइन या साफ्ट लाइन की बहस ही नहीं हो सकती. जहाँ तक सफदर का सवाल है तो वह हमारे संगठन के राष्ट्रीय महासचिव थे, जिसके ओहदे पर पहुँचने की एक मात्र काबिलियत उनकी अकादमिक योग्यता थी और वे पत्रकार थे. ये पूरा प्रचार मीडिया और पुलिस की अपनी कल्पनाओं की उपज है जो अपनी सुविधानुसार कभी भी कोई भी कागजी संगठन बनाते-बिगाड़ते रहते हैं.
• सिमी पर भड़काऊ पोस्टर छापने मसलन 'वेटिंग फॉर गजनी' या बाबरी मस्जिद तोड़ने वालों से लड़ने, मस्जिद का पुर्ननिर्माण करने संबधी पोस्टर व देश की अखण्डता को तार-तार करने वाले साम्प्रदायिक परचे जारी करने का आरोप है?
जिस वेटिंग फॉर गजनी वाले पोस्टर को बार-बार हमारे सांम्प्रदायिक होने के सबूत के बतौर प्रचारित किया जाता है, उसमें ऐसा कुछ भी आपत्तिजनक नहीं था. आखिर जिन लोगों ने संविधान के सामने शपथ लेने के बावजूद एक ऐतिहासिक धरोहर को तोड़कर देश की गंगा-जमुनी तहजीब को छिन्न-भिन्न किया, जिसके बाद हुए दंगो में हजारों हिन्दू-मुसलमान मारे गए, उन तत्वों के खिलाफ लड़ने के लिए खुदा से किसी योध्दा को भेजने की कामना करना कहाँ से सांप्रदायिक है? जहाँ तक बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण की बात है तो यह तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने भी वादा किया था. एक ऐसे पोस्टर को भी सरकार ने देश विरोधी बता दिया था, जिस पर संयुक्त राष्ट्र संघ के अमरीका के मातहत और दबाव में काम करने का आरोप था. जिस पर सुनवायी करते हुए जज एसएन ढींगरा ने कहा कि ये तो एके 47 से भी ज्यादा खतरनाक है.
जहाँ तक परचे का सवाल है तो 1999 में मैने सिमी की पत्रिका 'इस्लामिक मूवमेंट' में अंग्रेजी दैनिक 'एशियन एज' में छपे एक लेख का हिन्दी अनुवाद छापा था. जिसका मेरे ऊपर अभी तक मुकदमा चल रहा है. जबकि 'एशियन एज' के खिलाफ किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई.

3 टिप्‍पणियां:

Suresh Chandra Gupta ने कहा…

@"हम आह भी कर दें तो हो जाएं बदनाम, वो कत्ल भी कर दें तो चर्चा नहीं होता."

वाह भाई वाह, इस सादगी पर कौन न मर जाए ऐ खुदा.

anil yadav ने कहा…

देखा। इत्मीनान से पढ़ूंगा। यह वर्ड वेरीफिकेशन हटा दो खामखंा अडंगा डालता है।

Umesh ने कहा…

जरा सी समझ रखने वाला व्यक्ति अनुभुति कर सकता है की मुसलमानो के नाम से हो रहे धमाको के पीछे चर्च नियंत्रित राष्ट्र हीं है। वे एक तीर से दो शिकार कर रहे है। मामले को उजागर करने के लिए विश्व हिन्दु परिषद तथा मुस्लीम संगठनो को एक साथ आना होगा। अतः मै सभी हिन्दु एवम ईस्लामिक संगठनो से अपील करता हुं की वे बम विष्फोटो के जड तक पहुंचने मे एक दुसरे की मदत करे, ताकी अमन चयन कायम हो सके, ईंसानियत का कत्ल न हो, हिन्दु-मुसलमानो मे प्रेम पनप सके।

अपना समय