30 अक्तूबर 2008

'मुठभेड़ सही, तो जाँच से हिचक क्यों'

पाणिनी आनंद, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

'उस दिन की मुठभेड़ को लेकर हमारे जेहन में कई सवाल हैं जिनके जवाब नहीं मिल रहे। अगर यह मुठभेड़ सही थी तो इसकी जाँच से सरकार पीछे क्यों हट रही है। बाटला हाउस इन्काउंटर का सच सामने आना चाहिए...' यह कहना है दिल्ली के जामिया नगर इलाके में रहने वाले उन लोगों का जो चाहे-अनचाहे 19 सितंबर की पुलिस मुठभेड़ के गवाह बने.
पिछले दिनों दिल्ली के जामिया नगर इलाके में हुई पुलिस मुठभेड़ को लेकर अब स्पष्टीकरण और संदेह का सिलसिला तेज़ होता जा रहा है.
जहाँ एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने इस मुठभेड़ को सही ठहराते हुए इसकी जाँच की आवश्यकता को खारिज कर दिया है वहीं स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं, अधिवक्ताओं के समूह इसकी माँग और मज़बूती से उठाने लगे हैं कि कथित मुठभेड़ की न्यायिक जाँच हो.
पिछले महीने 18 सितंबर, दिन शुक्रवार को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में पुलिस की कुछ संदिग्ध लोगों से मुठभेड़ हुई थी. इसमें दो संदिग्ध लोगों और एक पुलिस इंस्पेक्टर की मौत हो गई थी. इस मुठभेड़ में एक कांस्टेबल घायल हो गया था.
पुलिस ने एक संदिग्ध को मौके से ही गिरफ़्तार कर लिया था जबकि पुलिस के मुताबिक दो लोग मौके से भागने में सफल रहे थे. पुलिस ने बाद में इन दोनों भागे हुए संदिग्धों को भी पकड़ लेने का दावा किया.
पर मुठभेड़ के बाद से ही इसकी सत्यता को लेकर सवाल भी उठने शुरू हो गए थे. मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं, अल्पसंख्यक आयोग, कुछ पत्रकारों और स्थानीय लोगों ने इस मुठभेड़ और पुलिस की भूमिका पर कई सवाल उठाए हैं.
मानवाधिकार आयोग इस मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस भी दे चुका है. फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग समितियों ने मुठभेड़ की जगह और आसपास के लोगों से बातचीत करके, मुठभेड़ के मामले में अभी तक सामने आए तथ्यों और पुलिस के बयानों, कार्यवाहियों के आधार पर कई सवाल उठाए हैं.
मुठभेड़ पर जन सुनवाई
इसी सिलसिले में रविवार को जामिया नगर में एक जन सुनवाई का आयोजन भी किया गया जहाँ पहली बार इस मुठभेड़ के संबंध में स्थानीय लोगों ने पूरे घटनाक्रम को सार्वजनिक रूप से बयान किया.
18 सितंबर की मुठभेड़ बाटला हाउस इलाके के एल-18 मकान में हुई थी. इसी गली में एल-17, एल-10 और एल-13 के अलावा अन्य आसपास के घरों से क़रीब सात लोगों ने सार्वजनिक मंच पर आकर अपने बयान कुछ वकीलों, अध्यापकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के एक पैनल के सामने रखे.
स्थानीय लोगों ने 19 सितंबर के घटनाक्रम को बयान किया
लगभग डेढ़ हज़ार की तादाद में स्थानीय लोग इस मामले की जन सुनवाई में मौजूद थे.
स्थानीय लोगों में से एक मौलाना अब्दुर्रहमान ने कहा, “हमें मालूम है कि अगर सारे तर्कों को सामने रख दिया गया तो पुलिस उनके जवाब खोजना शुरू कर देगी इसलिए जब ज़रूरत पड़ेगी, हम ज़रूरी सबूत अदालत के सामने पेश करेंगे.”
अब्दुर्रहमान वो शख़्स हैं जिन्होंने मुठभेड़ में मारे गए दोनों संदिग्धों के शवों को नहलाने और फिर दफ़नाने का काम किया था. उन्होंने बताया कि दफ़नाने से पहले उनके शवों की तस्वीरें भी ली गई थीं जिन्हें देखकर लगता है कि गोली मुठभेड़ में नहीं बल्कि सीधे सिर में बहुत पास से मारी गई थीं.
एक अन्य स्थानीय गवाह मसीह आलम, जो कि पेशे से वकील हैं, ने भी सिलसिलेवार ढंग से बताया कि कैसे पुलिस ने कार्रवाई को अंजाम दिया. उन्होंने बताया कि जब इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा एल-18 से बाहर आए तो उनके कंधे से खून रिस रहा था. जिन शवों को पुलिस पूरी तरह से लपेटकर ले गई, उनसे कोई खून नहीं टपक रहा था.
स्थानीय लोगों में से एक, फ़ैय्याज़ अहमद अपनी आपत्ति जाहिर करते हुए कहते हैं, “हम पढ़े-लिखे लोग हैं, पुलिस को हमसे मदद ही मिलती. पुलिस ने मुठभेड़ के बाद स्थानीय लोगों को पंचनामे और शिनाख़्त के लिए क्यों नहीं बुलाया. क्यों नहीं उन संदिग्धों की पहचान करवाई गई. क्यों उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है.”
जन सुनवाई का आयोजन जामिया मिल्लिया युनिवर्सिटी के टीचर्स सॉलिडेरिटी फ़ोरम की ओर से किया गया था. इसके लिए एक पैनल बनाया गया था जिसमें स्वामी अग्निवेश, अरुंधति रॉय, प्रशांत भूषण, सईदा हमीद, कनिका सरकार, तृप्ता वाही, हर्ष मंदर, जॉन दयाल और कविता कृष्णन जैसे कई मानवाधिकार कार्यकर्ता शामिल थे.
जन सुनवाई में रविवार के बयानों को इस पैनल ने दर्ज कर लिया है जिसके आधार पर अगले एक-दो दिनों में रिपोर्ट जारी की जाएगी. पर पैनल के लोगों ने जन सुनवाई के बाद आम सभा में बोलते हुए कहा कि स्थानीय लोगों की इस मामले की न्यायिक जाँच की माँग का वे समर्थन करते हैं.
जाँच की ज़रूरत नहीं
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों की ओर से जाँच की माँग ऐसे वक्त में प्रभावी होती जा रही है जब प्रधानमंत्री सहित राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी जाँच की ज़रूरत को नकार चुके हैं.
निसार आज़मी का बेटा साकिब निसार संदिग्धों में से एक है और इन दिनों पुलिस हिरासत में है
दिल्ली पुलिस के आला अधिकारी इस बारे में अपना तर्क रखते हुए लगातार यह कहते रहे हैं कि पुलिस की कार्यवाही पर शक करना ग़लत है और इस मामले को बेकार में इतना तूल दिया जा रहा है.
इस जन सुनवाई में उठाए गए सवालों पर जब बीबीसी ने दिल्ली पुलिस से प्रतिक्रिया मांगी तो दिल्ली पुलिस प्रवक्ता राजन भगत ने कहा, "इस मुठभेड़ के सिलसिले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के जो निर्देश हैं, उनका पालन किया जा रहा है. निर्देशों का किस तरह पालन हो रहा है, इसकी जानकारी आयोग को ही दी जाएगी. मीडिया को अभी इस बारे में बताना ज़रूरी नहीं है."
दिल्ली पुलिस के अधिकारी पहले भी मुठभेड़ पर संदेह के सवाल को खारिज करते रहे हैं.
पुलिस प्रवक्ता पहले ही बीबीसी से बातचीत में कह चुके हैं कि 'दिल्ली पुलिस ने इस मुठभेड़ में अपना एक अफ़सर खोया है जिसे वीरता के कई पुरस्कार मिल चुके हैं और इसके आगे और ज़्यादा कुछ कहने की ज़रूरत नहीं रहती.'
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के संयुक्त पुलिस आयुक्त करनैल सिंह भी कह चुके हैं कि उनके पास पुलिस की इस कार्रवाई को लेकर पक्के सबूत हैं और बेवजह पुलिस पर इल्ज़ाम लगाना ठीक नहीं है.

1 टिप्पणी:

COMMON MAN ने कहा…

vaakai aap theek kahte hain, lekin banaras ya shayad ilahabad me pichhle saal ek abhiyukt to daudakar goli maar di thi pulis ne, do tv par khoob dikhaya gaya, aap uske samarthan me bhi kahin koi dharna pradarshan karenge ya nahin

अपना समय