27 अक्तूबर 2009

मीडिया का एक चेहरा यह भी

इलाहाबाद में गंगा के कछार की मध्यधारा में सामूहिक रूप से कासा काटने को लेकर अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा के नेतृत्व में किसानों के आन्दोलन को स्थानीय मीडिया ने नक्सली हिंसा करार दिया. जबकि ये किसान केवल अपने परम्परागत हसिया और लाठी के साथ प्रदर्शन कर रहे थे. वही जब किसानों के आन्दोलन के जवाब में खनन माफियाओं की तरफ से बजरंग दल के गुंडों ने खुलेआम असलहों के साथ प्रदर्शन किया तो इसे लाल सलाम से निपटने की रणनीति बताया गया. नक्सलवाद के खिलाफ चलाई जा रही सरकारी मुहीम में मीडिया की भूमिका पहले से सरकारी एजेंसी की तरह है. इलाहबाद की मीडिया इससे आगे बढ़कर पुलिस के इशारे पर बजरंग दल और खनन माफियाओं के पक्ष में खड़ी है. प्रस्तुत है मीडिया की इस भूमिका के खिलाफ किसान आन्दोलन की खबर - मोडरेटर

13.10.09

अमर उजाला की खबर मनगढ़ंत


अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा ने हिन्दी दैनिक अमर उजाला द्वारा फ्रंट पेज रिपोर्ट ‘लाल सलाम की खूनी जंग’’ की कड़ी निन्दा करते हुए कहा है कि यह रिपोर्ट प्रेरित तथा विद्वेषपूर्ण है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लाल सलाम ने मुखबिरी के शक में हाथ का पंजा काट डाला। यह तथ्यहीन भी है और जानबूझकर संगठन को बदनाम करने व ऐसी धारणा पैदा करने, कि कोई गहरा षडयंत्राकारी काम संगठन कर रहा है, से प्रेरित है। यह मीडिया नैतिकता के भी विरूद्ध है।

11 अक्टूबर को नन्दा का पूरा गांव में लाल सलाम की एक बड़ी जनसभा थी जिसमें करीब 2000 लोगों ने भाग लिया। जिला अधिकारी कौशाम्बी को घाटों का निरीक्षण करने आना था। पिछले 1 अक्टूबर से ए0आई0के0एम0एस0 कार्यकर्ता घाटों को भ्रष्ट जिला पंचायत व ठेकेदारों की मनचाही वसूली से मुक्त कराकर नम्बर बांधकर घाटों को खुद चला रहे हैं। इससे उतरवाई की दरें सीधा 66 फीसदी घटा दिया है।

यद्यपि किन्हीं कारणों से जिला अधिकारी नन्दा का पूरा नहीं पहुंचे, घाटों पर हासिल इस विजय से लोग जोश और उत्साह के साथ अपनी बैठक करके वापस लौटे।

बैठक के बाद भकन्दा गांव के कुछ लोग आपस में लड़ गए जो पुरानी रंजिश से प्रेरित था। रामभवन को चोट आई और ए0आई0के0एम0एस0 उपाध्यक्ष छेदी लाल तथा महासचिव फूलचन्द के बीचबचाव से उसे बचा कर सीधा अस्पताल भेजा गया। ए0आई0के0एम0एस0 के शिवलाल तथा कल्लू खुर्द उसे लेकर गए तथा रामबालक, राजकुमार, गणेश, ओमप्रकाश तथा भिन्टू के विरूद्ध उनका केस दर्ज कराया। आज वो अपनी सुसराल, सराय अकील में रहकर उपचार करा रहा है।

इस घटना को अमर उजाला ने कहा कि ‘‘दाहिना हाथ पंजे से कट गया है’’, ‘‘मरणासन हालत में भरती कराया गया है’’, ‘‘कथित मजदूर संगठन के नेता खामोश हैं, उनके माबाइल स्विच आफ कर लिए हैं’’, ‘‘मुखबिरी के संदेह में अपने ही साथी को किया लहूलुहान’’, आदि।

सच यह है कि रामभवन का दाहिना हाथ पंजे से नहीं कटा है। उसे मुखबीर तो अखबार ने बना दिया पर यह नहीं लिखा कि उसका इलाज व एफ0आई0आर0 लाल सलाम के लोगों ने ही लिखवाया। बाद में रामबालक आदि की सदस्यता को भी सस्पेण्ड किया गया। और कार्यालय का उपरोक्त लिखा हुआ फोन तो हमेशा चालू रहता है और मोबाइल भी चालू रहे हैं, अगर बत्ती के अभाव में डिसचार्ज न हुए हों।

ए0आई0के0एम0एस0 इस विज्ञप्ति द्वारा एक सार्वजनिक अपील करती है कि तथ्यों को मजदूरों के विरूद्ध तोड़मरोड़ कर पेश न किया जाए। यह न केवल अनैतिक है, ये उन मेहनतकश मजदूरों को लम्बा नुकसान पहुंचाती है, जो खुद अपना पेट काटकर दूसरों का आराम सुनिश्चित करते हैं, खास तौर पर उन लोगों का जो दूसरों की ही मेहनत पर जिंदा हैं। यही नहीं इससे लाभ भी माफिया और भ्रष्ट अधिकारियों को होता है जो देश की जनता के दुश्मन हैं।

27.10.09

अखबारों ने फर्जी खबरे छपी


अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा (ए0आई0के0एम0एस0) ने संगठन द्वारा हिंसा करने की प्रेस रिपोर्टों की निन्दा करते हुए कहा है कि बिना किसी घटना हुए ही इस तरह की रिपोर्टों के छपने का उद्देश्य संगठन को बदनाम करने के लिए है और जनबूझकर पुलिस ऐसी रिपोर्टें छपवा रही है। सभा के प्रदर्शनों में भी हिंसा की कोई वारदात आज तक सामने नहीं आयी है।

अगर उसे ‘हिंसा’ कहा जा सके तो हिंसा की एक मात्रा घटना मजदूरों द्वारा मशीन और लोडर रोकने की है, जो किसानों और मजदूरों को उजाड़ रही थीं, और साथ में रवन्ने का गैर कानूनी कर तथा रायल्टी रोकने की। मशीनें, रायल्टी तथा अतिरिक्त रवन्ना चार्ज सब गैर कानूनी है और इसे रोकने की जिम्मेदारी पुलिस की है। अप्रैल 2008 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खण्डपीठ ने भी कहा कि उप खनिजों में पारम्परिक समुदायों को काम रोकने वाली मशीनें गैर कानूनी है और सरकार को इन्हें रोकना चाहिए।

इसके साथ किसान सभा ने उतरवाई में लिए जाने वाले टोल कर तथा मेलों में अतिरिक्त तहबाजाारी रोकने का प्रयास किया। यद्यपि किसान सभा कुछ हद तक सफल हुई, उसके कार्यकर्ता बड़े ठेकेदारों और पुलिस के हमले के निशाने पर बने रहे। पुलिस ने नेताओं पर कई फर्जी मुकदमें भी दर्ज किए ह। हाल में आई0जी0 ने नेताओं पर धारा 384 के अन्तर्गत, एक्सटार्शन का केस दर्ज करा दिया। जबकि नेता किसी से भी पैसा नहीं वसूलते और जो ठेकेदार गैर कानूनी वसूली करते ह. उनमें से एक पर भी ऐसा केस दर्ज नहीं हुआ।

केवल अपने खाल बचाने के लिए पुलिस किसान मजदूर सभा द्वारा हिंसा की कहानियां छपवा रही है। वो सभा द्वारा हिंसा की एक भी घटना नहीं गिना सकती फिर भी जोर-शोर से लाल सलाम की हिंसा, हथियारों का इस्तेमाल, की बातें लिखी जा रही ह। यह समझना जरूरी है कि आम लोग गुण्डों से अपनी रक्षा के लिए लाठी लेकर गांव से चलते ह। पुलिस चाहती है कि वो इन्हें रोक दे और सामन्ती गुण्डों के हमले का आसान शिकार बन जाएं।

पुलिस क्षेत्रा में दुर्भावना फैलाने और ए0आई0के0एम0एस0 नेताओं पर हमले प्रेरित करने के लिए इस तरह की कहानियां छपवा रही है। एस0ओ0 घूरपुर सतपाल सिंह ने मेले में बजरंग दल कार्यकर्ताओं द्वारा ऐसे हमले करवाए। 25 अक्टूबर 2009 को बजरंग दल नेता मणी जी तिवारी के नेतृत्व में एस0ओ0 ने गैरकानूनी बन्दूकों के साथ बजरंग दल का प्रदर्शन करवाया। न तो बजरंग दल पर कार्यवाही हुई और न ही एस0ओ0 पर। हालांकि ये बन्दूकें गैर कानूनी है।

सुरेश चन्द्र,
महासचिव,
अखिल भारतीय किसान मजदूर सभा

1 टिप्पणी:

Suman ने कहा…

मीडिया नैतिकता के भी विरूद्ध है।
poonjivaadi media mein naitikta kahan hoti hai

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