16 नवंबर 2009

‘अंग्रेजी हुकूमत’ का नहीं चला जोर, शहीद को हजारों लोगों ने याद किया

- पुलिस ने जगह-जगह लोगों को रोका, छावनी में तब्दील हुआ नंदा का पूरा गांव

विजय प्रताप

16 नवम्बर, 1857 को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ते हुए शहीद हुई दलित वीरांगना उदा देवी को याद करने के लिए सोमवार को कौशाम्बी जिले के सराय अकील थाना क्षेत्र में नंदा का पुरा में हजारों लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने इस जनसभा को रोकने के लिए लगाई गई धारा 144 व एक दिन पूर्व पुलिस की अंग्रेजी सिपाहियों सी वहशियत भी लोगों को एकजुट होने से नहीं रोक सकी। शहीद उदा देवी पासी यादगार समिति की ओर से आयोजित जनसभा में लोगों ने शहीद उदा देवी को याद करते हुए आज के सत्तानशिन अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने की कसमें खाई।
प्रतिबंध के बाद भी सभा करने पर अडिग ग्रामीणों पर रविवार शाम पुलिस ने बर्बरता पूर्वक लाठीचार्ज किया जिसमें करीब 30 लोग घायल हुए। पुलिस का यह हमला भी लोगों को दलित वीरांगना को याद करने से नहीं रोक सका और सोमवार को कौशाम्बी के अलावा, मउ, चित्रकूट, इलाहाबाद के दूर-दराज के गांवों से ट्ैक्टर-ट्ाॅलियों में भर कर हजारों मजदूर-दलित व कामगार जनसभा में पहुंचे। कौशाम्बी प्रशासन ने जनसभा स्थल को छावनी में तब्दील कर दिया था। पुलिस ने तिल्हापुर मोड़, पुरखास, गढ़वा, सराय अकील, प्रतापपुर, तथा लालापुर में करीब 1000 मजदूरों को लाठीचार्ज कर बिखेरने का प्रयास किया और सभा में शामिल होने से रोके रखा। इसके बावजूद जनसभा में पांच हजार से ज्यादा लोग एकत्रित हुए। सभा स्थल पर मेले जैसा माहौल नजर आया। लोगों के उत्साह को देखकर पुलिस भी कुछ करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी।
जनसभा को संबोधित करते हुए समिति के संयोजक व मजदूर नेता सुरेशचंद्र ने कहा कि मायावती सरकार अंग्रेजों के नक़्शेकदम पर चलते हुए राज्य में खेती की जमीने बहुराश्ट्ीय कम्पनियों को सौंप रही है। गंगा एक्सप्रेस वे, जिसे जे0पी0 ग्रुप बनवा रहा है, उसमंे 30 फीसदी शेयर विदेशी कम्पनियों का है। बीज, खाद के धंधों, खनन ऊर्जा की कम्पनियों से लेकर उपभोग के सामानों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का वर्चस्व है और स्थानीय रोजगार व कारीगर बरबाद हो रहे हैं। उदा देवी ने इसी विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ संघर्श करते हुए शहीद हुईं। उनकी विरासत के लोग ऐसी और भी शहादत के लिए तैयार हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी माले न्यू डेमोक्रेसी के राज्य सचिव डाॅ आषीश मित्तल ने कहा कि ऊदादेवी पहले स्वतंत्राता संग्राम दलित महिला नायिका थीं। उन्होंने लुटेरे अंग्रेजों को भारत से बाहर भगाने के लिए अपनी जान दी। उस समय अंग्रेज जीत गए क्योंकि दलाल जमींदारों ने उनका साथ दिया। जनसभा की अध्यक्षता कर रहे रामलाल भारतीया ने कहा कि देश में शासन कर रहे काले अंग्रेज नहीं चाहते की दलित-मजदूर आजादी के नायकों से प्रेरणा लें। वह केवल उनकी मूर्तियां सजाकर उन पर माफियाओं, जमींदारों व दलालों से माल्यार्पण कराना चाहते हैं। सभा में परिवर्तन सांस्कृतिक मंच के कामता, सुदामा, बोधा, गेंदालाल तथा दीपक नें क्रांतिकारी गीत गाए।
उधर, ग्रामीणों पर लाठीचार्ज की घटना का कई सामाजिक संगठनों, मानवाधिकार संगठनों, बुदिृधजीवियों व पत्रकारों ने आलोचना की है। घटना के विरोध में पीयूसीएल ने मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर राज्य में मानवाधिकारों के रक्षा की गुहार लगाई है। जर्नलिस्ट यूनियन फार सिविल सोसायटी (जेयूसीएस) के ऋषि कुमार सिंह, अवनीश व लक्ष्मण प्रसाद ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि सरकार बहुराश्ट्ीय कंपनियों व स्थानीय सामंतों की सत्ता को बचाए रखने के लिए दलितों को एकजुट नहीं होने देना चाहती। उन्होंने ग्रामीणों पर लाठियां बरसाने वाले एसपी आर के भारद्वाज के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की। पत्रकार अनिल चमडिया ने कहा कि 1857 की लड़ाई में जितने दलितों ने कुर्बानिया दी, उस इतिहास को दबा दिया गया। दलितों के संघर्ष के इतिहास को दबाना वास्तव में दलित जनसमुदाय के भीतर संघर्ष की चेतना को कुंद करने की साजिश है।

2 टिप्‍पणियां:

Pandit Kishore Ji ने कहा…

badiya jaankaari di aapne

Suman ने कहा…

nice

अपना समय