04 दिसंबर 2009

बसपा सरकार में दलितों को डीएपी मिलना हुआ मुश्किल

राकेश कुमार


यूं तो बसपा दलितों और वंचितों की पार्टी कही जाती है लेकिन बसपा सरकार की असल में मलाई तो ब्राह्मण और दबंग ही खाँ रहे हैं। क्षेत्र में सवर्णों की दबंगई के चलते दलित व गरीब किसानों के लिए सहकारी गोदाम में मिल रही डीएपी तो ईद का चाँद हो गयी है। इन गरीब किसानों को गेहूं की बुआई के लिए जहां एक तरफ प्रकृति की मार झेलनी पड़ रही है तो वहीं दूसरी तरफ दंबग सवर्णों की मार भी सहनी पड़ रही है। इस दो तरफा मार से गरीब किसानों की मुश्किले बढ़ गयी हैं। इलाहाबाद और जौनपुर के मध्य सतहरिया औद्योगिक क्षेत्र (जौनपुर) स्थित सहकारी काॅपरेटिव में वितरित हो रही डीएपी दलितों और गरीबों को मिलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है। इससे आहत क्षेत्र के दलित जो बसपा को वोट देना अपनी मर्यादा समझते हैं, भी अब अपनी उस मर्यादा को तोड़ने का मसौदा तैयार कर चुके हैं।
दरअसल इसके पीछे खास वजह है आस-पास के ब्राह्मणों की दंबगई, जो काॅपरेटिव में कब्जा जमा चुके हैं और अपनी मनमर्जी से लोगों को डीएपी दिलवाते हैं। मजेदार बात तो यह है कि यह सारा खेल स्थानीय बसपा विधायक सुभाष पाण्डेय (संस्कृति मंत्री) की निगहबानी में हो रहा है। उनके इस कार्य में स्थानीय बसपा सांसद धनंजय सिंह भी ताल से ताल मिला रहे हैं। गौरतलब है कि इस पूरे क्षेत्र में डीएपी की कालाबाजारी इस ठंड के मौसम का सबसे गरम धन्धा बन गया है। जिसके चलते दबंग लोग काॅपरेटिव से सस्ते दर पर खाद खरीदकर खुले बाजार में परोस रहे हैं। बताते चलें कि काॅपरेटिव में मिल रही डीएपी का मूल्य 473 रूपये है जबकि बाहर बिकने वाली डीएपी का मूल्य 650 से 700 रूपये के बीच होने के साथ-साथ नकली भी है।
ज्ञातब्य हो कि इस काॅपरेटिव में कुल 9 गाँव शामिल किये गये हैं जिसमें सतहरिया, सरोखनपुर, बिजाधरमऊ, सरायफत्तू, आदेपुर, अमोध, कामापुर, ऊचैरा और भसोट आदि गाँव शामिल हैं। इन सभी गाँवों के दलितों और गरीब मजदूरों को डीएपी नहीं मिल रही है जिसे लेकर इस वर्ग के लोगों में काफी आक्रोश है। आदेपुर गाँव के दलित सरजू प्रसाद बताते है कि 18 नवम्बर को हम अपने नाती को साथ लेकर चद्दर ओढ़े रात चार बजे ही सतहरिया काॅपरेटिव पहुंच गये थे। यहां तक कि लाइन में सबसे आगे भी थे लेकिन जब खाद बटने का हुआ तो कुछ दंबंग ब्राह्मण, जो क्षेत्र के बसपा विधायक के काफी नजदीकी भी बताये जाते हैं आ गये और लाइन को तितर-बितर कर के अपने लोगों को आगे करवा दिये और बाद में आने वाले सभी पंडितो को अपने आगे करते गये। जिसका परिणाम यह हुआ कि हम लोगों को आज भी खाद नहीं मिल सकी। इसी बीच एक गरीब किसान कमलेश ने अपनी आप बीती सुनाते हुए कहा कि पंडितों की इस तरह की जबरदस्ती हरकत देख मुझसे भी नहीं रहा गया और मैं भी किसी तरह अंदर घुस गया। जहां पर विधायक के दो करीबी आदमी, आदेपुर के पूर्व प्रधान छोटेलाल तिवारी और वर्तमान बीडीसी फूलचन्द तिवारी सेना के जवान की तरह तैनात थे। इन्हीं के इशारे पर मुझे पुलिस से पिटवाया गया और धक्का मारकर बाहर निकलवा दिया गया। जब मैने इसका विरोध किया और बसपा के कार्यकर्ताओं से इसकी शिकायत करने की चर्चा छेड़ी तो मुझे पुलिस द्वारा अन्दर ले जाया गया और धमकाया गया कि एक बोरी खाद लो, चुपचाप चले जाओं, इसकी शिकायत कहीं पर की तो तुम्हारा घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जायेगा।
बाहुबली ब्राह्मणों की इन हरकतों से आम गरीब और दलित किसान आहत है। वे इसलिए भी और अधिक परेशान है कि यह सब खेल बसपा सरकार के एक विधायक की छत्रछाया में हो रहा है। अब इनसे निपटने के लिए आस-पास के सभी दलित, सरोज, बिंद अैर तमाम अन्य गरीब जातियों के किसान इसके विरोध में उतरने की रणनीति बना चुके हैं। डीएपी के मुद्दे पर बन रहे इस मोर्चे की कमान भी बसपा के ही एक सेक्टर महासचिव जटा शंकर और कांशीराम गरीब सहयता समिति के अध्यक्ष रमा शंकर गौतम व उपध्यक्ष उमेश गौतम सभालेंगे। जटा शंकर का कहना है कि अगले जिस किसी दिन भी डीएपी का वितरण होगा पूरी तैयारी के साथ चलेगें, यदि खाद नहीं मिली तो वहीं से स्थानीय विधायक के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जायेगा। उन्होंने बताया कि ब्राह्मण विधायक होने के नाते क्षेत्र के दबंग सवर्णों का दबदबा बढ़ गया है। वे जिसे चाह रहे हैं उसे पुलिस से पिटवा दे रहे हैं। इनके मुताबिक इस काम में बसपा विधायक सुभाष पाण्डेय के भाई प्रकाश पाण्डेय महती भूमिका अदा कर रहे हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में दलितों व गरीबों का बसपा सरकार से मोहभंग होना शुरु हो गया है। यदि यही हालात रहे तो बसपा के वोटबैंक माने जाने वाले दलित, ही उसके बैंक से अपना जनाधार वापस ले लेंगे। ऐसा होने से बसपा का भी दिवाला निकलने में अधिक वक्त नहीं लगेगा। अमोध गाँव के 65 वर्षीय शंकरजी यादव और आदेपुर के मुन्नु बिन्द बताते हैं कि क्षेत्र में इस समय सवर्णों की गुण्डई जिस तरह से बढ़ रही वह 40 साल पुरानी ब्राह्मणवादी सांमती व्यवस्था की यादें ताजा कराती है। मुन्नु कहते हैं कि यह नई सामंती व्यस्था उस 40 साल पुरानी सामंती व्यवस्था से भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि पहले वे गाली देकर, मार-पीट कर किसी चीज को हड़पते थे लेकिन अब तो साथ-साथ चल भी रहे हैं और दांव पाते ही हमारा गला काटने में भी देर नहीं लगाते। उनके इस शातिराना व्यवहार को कोई गरीब दलित समझ भी नहीं पाता और आसानी से वह उनका शिकार भी बन जाता है। वहीं सरोखनपुर के अरविंद चैहान का कहना है कि 20 दिनों के अंदर दो बार खाद बट चुकी है लेकिन अभी तक 5 फीसदी दलितों को डीएपी नहींे मिल सकी है। उनका कहना है कि दलितों को इस हालाल से निजात पाने के लिए अब उन्हे अपना कोई और मसीहा खोजना पड़ेगा। तभी इन सामंतों से छुटकारा मिल सकता है।

1 टिप्पणी:

anurag ने कहा…

bahut badhiya

अपना समय