21 सितंबर 2010

फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया

अंबरीश कुमार

मीर ,चकबस्त और बेगम अख्तर के फैजाबाद में फिर युद्ध जैसी तैयारी !

 ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए । पिछले एक दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही अयोध्या जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया केंद्र बनाया गया । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।

उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो क़तर-ए- खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।

पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ ।

राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।

अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।

कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।

अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह में डाल रही थी ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।

यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि का व्यापार है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा ।

जनसत्ता
Janadesh.in

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