11 दिसंबर 2010

मानवाधिकार दिवस पर परिचर्चा

 विदेशी कंपनियों पर निर्भर मानवाधिकार
गौतम नवलखासचिव, पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीयूडीआर), नई दिल्ली
मानवाधिकार की समस्या राज्य द्वारा खड़ी की गई है। पूरे देश में न केवल मानवाधिकारों का हनन हो रहा है, बल्कि सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं के रास्ते में नई-नई मुश्किलें खड़ी की जा रही हैं। मुख्तलिफ़ इलाकों में कार्यकर्ताओं को जाने से रोका जा रहा है। कई दुर्गम इलाकों में पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का उत्पीड़न लगातार जारी है। उन इलाकों को पूरे देश से काट दिया गया है। वहां किसी को आने-जाने नहीं दिया जा रहा है। सिविल लिबर्टिज के कार्यकर्ताओं को भी लगातार उत्पीड़ित किया जा रहा है। उन्हें माओवादी और आतंकी बताकर उन पर फर्जी मुकदमें लादे जा रहे हैं। यह सबकुछ जानबूझकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हमने पिछले दिनों देखा कि छत्तीसगढ़, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में आदिवासियों की जमीने जबरन छीनकर बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को दी गई। विरोध करने पर आदिवासियों को माओवादी करार देकर गोली से उड़ा दिया गया, उनके घरों को जला दिया गया। ऐसे में यह उम्मीद करना ही बेकार है कि सरकार या कोई सरकारी संस्था मानवाधिकारों की रक्षा करेगी। यह काम सिविल लिबर्टिज कार्यकर्ताओं को ही करना होगा। वैसे, भी देखें तो मानवाधिकारों के मामले में वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति दिनों-दिन खराब होती जा रही है। प्रदेशों में मानवाधिकार हनन की होड़ लगी है। 
गरीबों को मानवाधिकार नहीं
प्रशांत भूषणसुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और मानवाधिकार कार्यकर्ता
हिंदुस्तान में गरीब-असहाय लोगों का कभी कोई अधिकार रहा ही नहीं है। व्यवस्था को ऐसा जटिल बना दिया गया है कि अगर किसी के साथ कोई अन्याय होता भी है तो वह न्यायालय में जाने से पहले कई बार सोचेगा। गरीब आदमी इस न्यायिक व्यवस्था में घुस भी गया तो यह जरूरी नहीं कि उसे न्याय मिलेगा ही। यहां ज्यादातर जज सम्पन्न वर्गों से आते हैं। उन्हें एक गरीब या आम आदमी की समस्याएं समझ में नहीं आती। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में कानून की व्याख्याएं बहुत बदल गई हैं। न्याय न मिलना, मानवाधिकार हनन नही ंतो क्या है? सरकार, बहुराष्ट्ीय कम्पनियों के और पुलिस-प्रशासन, सरकार के इशारों पर गरीब आदिवासियों पर लगातार जुल्म ढाह रहे हैं। ग्रीनहंट जैसे सरकारी अभियान खुल्लम-खुल्ला मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं। खनिज सम्पदा से भरे इलाकों को पिछड़ा रखकर वहां माओवाद को पनपने का मौका दिया जा रहा है। पुलिस और सुरक्षा बलों को मनमाने अधिकार देने के लिए नए-नए कानून बनाए जा रहे हैं। हम एक ही सरकार से यह भी उम्मीद करें कि वह हमारे मानवाधिकारों की रक्षा करेगी और वही सरकार मानवाधिकारों की हत्या करने वाले काननू बनाये यह बहुत ही हास्यास्पद बात होगी। अभी कोई भी सरकार यह दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा करती है।
 
फर्जी मुठभेड़ की संस्कृति
चितरंजन सिंह, राष्ट्ीय उपाध्यक्ष, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टिज पीयूसीएल
    भारत में मानवाधिकारों की स्थिति तो सरकारी संस्थाओं की ही रिपोर्ट बयान कर रही हैं। फर्जी मुठभेड़ और गिरफ्तारियां पुलिसिया कामकाज की एक संस्कृति बनती जा रही है। राष्ट्ीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि फर्जी मुठभेड़ों के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है। आतंकवाद के नाम पर पूरे देश से बड़े पैमाने पर मुस्लिम युवाओं की गिरफ्तारियां हुई। सैकड़ों लोग जेलों में बिना किसी कसूर के सड़ रहे हैं। पुलिस उन पर चार्जशीट तक नहीं दाखिल कर पाई है। माओवाद के नाम पर आदिवासियों पर जुल्म किया जा रहा है। ऐसे लोगों के लिए मानवाधिकार के कोई मायने नहीं है। देश के अधिकांश हिस्सों में यही हो रहा है। लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार तक नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में पिछले दिनों विरोध प्रदर्शनों पर पुलिस फायरिंग में सैकड़ों युवा मारे गए। उत्तर-पूर्व से लेकर छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट तक ऐसा क्षेत्र बनता जा रहा है, जहां सरकारी संस्थाओं को मानवाधिकार हनन के लिए लगभग प्रोत्साहित किया जा रहा है। मानवाधिकार हनन के लिए बकायदा कानून बनाये जा रहे हैं। मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हमें ही आगे आना होगा। सरकारी और पुलिस के जुल्मों का मुकाबला करना होगा। तभी हम मानवाधिकारों की रक्षा के संघर्ष को आगे बढ़ा सकेंगे।
राज्य जिम्मेदार
राजेन्द्र सच्चर,
पूर्व मुख्य न्यायाधीश
भारत में सभी को समान संवैधानिक अधिकार मिले हुए हैं। राज्य कई बार अपने दायरे से बाहर जाकर इन अधिकारों का हनन भी करता है। लेकिन वहीं हमें ये भी अधिकार है कि हम इसके खिलाफ़ आवाज उठा सके। अखबारों को लिखने की पूरी आजादी है। उन्हें लगता है कि किन्हीं अधिकारों का हनन हो रहा है या सरकार कुछ गलत कर रही है तो वह उस पर जनमत तैयार कर सकते हैं। जनमत के माध्यम से सरकार पर यह दबाव डाला जा सकता है कि वो मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करे। यह सही है कि कश्मीर सहित कई प्रदेशों में मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। लेकिन इसे सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता। अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग स्थितियां हैं। अगर मानवाधिकारों का हनन होता है तो लोगों को विरोध करने का भी अधिकार है। मानवाधिकार हनन के लिए पूरी तरह से राज्य जिम्मेदार हैं। मानवाधिकारों की रक्षा में अदालतों की भूमिका सीमित होती है। सरकार जो कानून बनाती है, न्यायपालिका को उसी दायरे में काम करना होता है। सरकार अगर पोटा जैसे कानून बनाएगी तो जाहिर सी बात है कि उससे मानवाधिकारों का हनन होगा। न्यायपालिका में भी अलग-अलग सोच के लोग हैं। सभी अच्छे हों यह भी अपेक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए इस पर भी सवाल उठते हैं।
 
प्रदर्शन का भी अधिकार नहीं
 
प्रो. एस.ए.आर. गिलानीमनवाधिकार कार्यकर्ता
भारत में लगभग सभी लोकतांत्रिक संस्थाएं खोखली हो चुकी हैं। सत्ता की प्रवृत्ति फासीवादी हो चुकी है। विरोध प्रदर्शन तक का अधिकार लोगों को नहीं दिया जा रहा है। कश्मीर में अभी 112 नौजवानों को केवल इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह विरोध प्रदर्शनों में शामिल थे। बच्चों की गिरफ्तारियां हो रही हैं। वहां के जेल निर्दोष नौजवानों से भरी हैं। कश्मीर को दिल्ली ने हमेशा उपनिवेश की तरह सुलूक किया है। ऐसा बर्ताव तो ब्रिटिश हुकूमत ने भी नहीं किया होगा। ऐसे ही दूसरे प्रदेशों में आदिवासियों-दलितों के मामले में भी है। वहां माओवाद के नाम पर लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है। बहुराष्ट्ीय कम्पनियों को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार सभी कानूनों को ताक पर रखकर समझौते कर रही है। उन्हीं के लिए सैन्य बलों का इस्तेमाल किया जा रहा है। यह पूरे देश में चल रहा है। मानवाधिकारों की लड़ाई सरकारी संस्थाओं के तले नहीं लड़ी जा सकती। इसके लिए जम्हूरियत में विश्वास करने वाले लोगों को मिलकर लड़ना होगा। ऐसे आंदोलनों में निरंतरता की जरुरत है। सुफियान के मामले को लोगों ने पहले खूब जोर-शोर से उठाया। बाद में सीबीआई ने क्लीनचिट दी तो किसी ने कुछ नहीं बोला। मानवाधिकारों की लड़ाई को संगठित रूप से लड़ना होगा।
 
विजय प्रताप से बातचीत पर आधारित
 

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