06 अक्तूबर 2008

सोचने का परिणाम



कष्ट के परिणाम से हम दूसरों से क्या बड़े होंगे

व्यथा को भुलाने में अकेले हम कौन ऐसा तीर मारेंगे

भले ही चूकने में या निशाना साधने में हुनर दिखला लें

तथा यह भी

कि हरदम सोचते रहना किसी की शुद्धता उत्कृष्टता का नहीं लक्षण है

गधा भी सोचता है घास पर चुपचाप एकाकी प्रतिष्ठित हो

कि इतनी घास कैसे खा सकूंगा

और दुबला हुआ करता है।

- रघुवीर सहाय

कोई टिप्पणी नहीं:

अपना समय