18 अप्रैल 2009

आजमगढ़ को ऐसे समझें


राजीव यादव

‘‘अविभाजित उत्तर प्रदेश के किस जनपद को ‘आतंकियों का एक प्रजनन स्थल’ के अभिधान से कलंकित किया जाने लगा है? विकल्प ए-आजमगढ़ बी-अलीगढ़ सी-पिथौरागढ़ डी-प्रतापगढ़।’’ यह सवाल किसी सरस्वती शिशु मंदिर की परीक्षा में पूछा गया सवाल नहीं है, यह 22 फरवरी 09 को उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में तीस हजार भावी नौकरशाहों का जनमत संग्रह था। जो एक ऐसी नस्ल तैयार करना चाहता है जो हर हत्या को एनकाउंटर कहे।
पिछले दिनों मीडिया ट्रायल के बदौलत जो छवि निर्माण कार्यक्रम चल रहा था उसे यह वैधता देना मात्र था। विरोध के बाद आयोग ने कुछ लोगों को ब्लैक लिस्ट कर प्रश्न को भले ही हटा दिया लेकिन उसे जो राजनीति करनी थी उसने कर दी। रियल्टी शोज के लिए एक और नया सवाल कि किस प्रश्न को आयोग ने हटाया? इस मान्यता के इर्द-गिर्द बनती सर्वानुमति का परिणाम होता है कि ऐसी घटनाएं बड़ी आसानी से अपना काम करके आम जनमानस के दिमाग से विस्मृत हो जाती हैं।
पिछले दिनों से आजमगढ़ में अपना मीडिया बनाने की चर्चा चल रही है। हमारे लिए यह एक बड़ा सवाल था जिसका उत्तर आयोग के प्रश्न से हमें मिल गया। मीडिया क्या कर सकती है इसको आजमगढ़िए बाटला हाउस में देख चुके हैं। ‘सांम्प्रदायिकता व अफवाह फैलाने वाले पत्रकारों से अपील है कि कृपया यहां न आएं’ आजमगढ़ में बधे बैनरों ने जो कहा उसे बहुतों ने अब तक नहीं समझा। आजमगढ़ के लोगों ने देखा है कि कचहरी धमाकों के आरोपी तारिक के 12 दिसंबर 07 को अपहरण के खिलाफ चल रहे आन्दोलनों की खबरों को छापने वाली मीडिया ने 22 दिसंबर को पुलिस द्वारा बाराबंकी से गिरफ्तारी के दावे को किस तरह से बिना सवाल किए छापा ही नहीं बल्कि यहां तक लिख डाला कि ‘आतंक से पुराना है रिश्ता आजमगढ़ का’ हो या फिर ‘आ से आतंकवाद आ से आजमगढ़।’
आजमगढ़ के तारिक की रिहाई के लिए चल रहे आन्दोलन के दबाव में जहां यूपी सरकार को न्यायिक जांच बैठानी पड़ी तो वहीं आजमगढ़ से शुरु हुयी यह मुहीम आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए निर्दोष युवकों के आन्दोलन की आवाज बन गयी। पांच महीने बीत जाने के बाद भी जब संदेहास्पद बाटला हाउस एनकाउंटर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट जारी नहीं की गयी तो सूचना के अधिकार के तहत पूछे जाने पर दफा 81 के तहत सूचना पर अदालती प्रतिबंध की झूठी सूचना दी गयी। जबकि न्यायालय ने कोई पाबंदी नहीं लगायी है। ये सब हथकण्डे सिर्फ इसलिए क्योंकि मारे गए साजिद और आतिफ के जिस्म पर लगी गोलियां इशारा करती हैं कि उनकी ठण्डे दिमाग से नृशंस हत्या की गयी है। रहा सवाल अंसल प्लाजा वाले मोहन चंद्र शर्मा का जिन पर सीबीआई ने अलबद्र नाम के फर्जी आतंकी संगठन के नाम पर दो युवकों को फर्जी तरीके से फसाने का आरोप लगाया था, की शहादत पर उठ रहे सवालों पर सरकार के पास बगले झांकने के सिवा कुछ नहीं है।
बाटला हाउस प्रकरण पर राष्टीय मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जस्टिस राजेन्द्र बाबू यहां तक कह चुके हैं कि वह समानान्तर सरकार तो चला नहीं सकते, उनके पास बहुत ज्यादा अख्तियार नहीं है। वे स्वीकारते हैं कि सरकार से टकराव लेकर वो कोई तहकीकात नहीं कर सकते हैं। उनका साफ कहना है कि उत्तर भारत और गुजरात की सरकारें उनकी बात नहीं मानती। यहां गौरतलब यह भी है कि धमाके चाहे जहां भी उनके तार गुजरात से जोड़कर उसके कथित गुनहगारों को गुजरात पुलिस के हवाले ही किया जाता है जिसे महज संयोग नहीं माना जा सकता।
तकरीबन एक दशक से आजमगढ़ में स्थापित मीडिया के स्लीपिंग माॅड्यूल्स के बदौलत यह आपरेशन सफल हो पाया। इक्सवीं सदी के शुरुआती साल में जब यूपी में भाजपा सरकार थी तो आजमगढ़ से पहला ‘पाकिस्तानी जासूस पकड़ा गया’ जो ‘ससम्मान’ रिहा हो चुका है। ससम्मान रिहाई के बाद भी सामाजिक अस्वीकृति के चलते आतंकवादी होने का ठप्पा नहीं हट पाया इसके बाद क्या था। सिलसिला शुरु हो गया और हालात आज हमारे सामने है। यह पूरा फेनोमेना अंग्रेजों के उस कानून की याद दिलाता है जिसके तहत किसी जाति या क्षेत्र विशेष को अपराधी घोषित करके उनका नरसंहार करते थे जिसको आसानी से वैधता मिल जाती थी। हर घटना के बाद आसानी से पाकिस्तान का नाम ले लेने वाली सरकारों और मीडिया पर पडा़ेसी देशों के दबाव के चलते लम्बे समय से देश के अन्दर ऐसी जगह की जरुरत थी जो पाकिस्तान या बांग्लादेश का स्थनापन्न बन सके। जो यह सिद्ध करे कि हिन्दुस्तान का मुसलमान सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद का हथियार मात्र नहीं है बल्कि वह खुद इसे स्थापित करने के लिए तंजीमें बना रहा है। गुजरात के पुलिस कमिश्नर पीसी पाण्डे ने पहली बार गुजरात में हुए धमाकों के लिए इण्यिन मुजाहिद्ीन का नाम लिया था। उन्होंने इसके पीछे जो तर्क दिया था वह यह था कि सिमी ने अपने नाम के आगे से एस और पीछे से आई हटाकर आईएम यानी इण्यिन मुजाहिदीन बना लिया है। आईएम को ‘लांच’ करने वाले ये वही पीसी पाण्डे हैं जिन्हें कई मानवाधिकार संगठनों व नागरिक समाज ने गुजरात के मुसलमानों के ‘हाॅलोकास्ट’ में लिप्त पाया है तथा जिन्हें उनके इसी धर्म/कर्म निष्ठा के लिए गुजरात सरकार ने डीजीपी बनाया। आजमगढ़ इसके लिए सबसे मुफीद था क्योंकि आज आतंकवादी की जो भी पहचान बना दी गयी है वो सब कुछ यहां मौजूद है। मसलन यहां पर पाकिस्तान और बांग्लादेश की तरह ही इस्लाम को मानने वाले अच्छी-खासी संख्या में हैं। खाड़ी देशों में काम करने के चलते यहां पर भारी मात्रा मे पैसा आया है जिससे वर्गीय आधार पर देखें तो मुस्लिम समाज के अंदर ही दो तरह की प्रवृत्तियां विकसित हुई हैं। एक तरफ जहां बड़े पैमाने पर मदरसे उग आए हैं जिनमें गरीब परिवारों के बच्चे अपने परंपरागत दायरे में रहते हुए पढ़ते हैं। तो वहीं दूसरी ओर धनाड्य तबके में तकनीकी शिक्षा का क्रेज भी बढ़ा जो खाड़ी देशों में सस्ता तकनीकी श्रम बेच रहे हैं। पहली स्थिति में जहां आतंकवाद की कथित परिभाषा के चलते दाढ़ी-टोपी वालों को आसानी से आतंकी बताकर शिकार बनाया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ हाई टेक आतंकी होने के नाम पर आधुनिक रुझानों वाले युवकों को टारगेट किया जा रहा है। तीसरा आजमगढ़ उसी यूपी में है जहां पर काशी, मथुरा और अयोध्या जैसे संघ परिवार के हिन्दुत्वादी प्रयोगशालाएं हैं। जैसा कि संघ का फासिस्ट प्रयोग है कि अपने आस-पास के कुछ तबकों और इलाकों को ही आंतरिक शत्रु घोषित किया जाय। इस खांचे में आजमगढ़ बिल्कुल ठीक बैठता है। मसलन यूपी और इसके बाहर आजमगढ़ से भी ज्यादा मुस्लिम बाहुल्य इलाके हैं जैसे पश्चिमी यूपी में रामपुर, सहारनपुर, मेरठ, बिहार में किसनगंज या भगलपुर, केरल, बंगाल, और आंध्र प्रदेश के दर्जनों जिले हैं लेकिन उनका हिंदुत्ववादी रणनीति के तहत आतंकवाद के गढ़ के बतौर आसानी से छवि निर्माण करना उतना आसान नहीं था जितना की आजमगढ़ में था। क्योंकि इनके पूरे मंदिर आंदोलन जो अब तक का इनका सबसे बड़ा प्रयोग रहा है उसका इन क्षेत्रों में प्रभाव नगण्य रहा। जबकि अयोध्या से सटे हुए पूरे पूर्वांचल में इसकी तपिश सबसे ज्यादा थी। हालांकि आजमगढ़ उस बुरे दौर में भी सांप्रदायिक सौहार्द का केन्द्र बना रहा और यहां दंगे नहीं हुए।
आज हिंदुत्ववादियों ने अयोध्या से बढ़ी हुई चेतना पर आधुनिक अयोध्या के रुप में आजमगढ़ को खड़ा किया है। अयोध्या में उनका प्रत्यक्ष आक्रमण सदियों पहले हिंदुस्तान आए मुस्लिम शासक बाबर को सामने रखकर मुसलमानों पर था। तो आज उन्होंने इसी मिट्टी से पैदा हुए मुसलमानों को बाबर का स्थानापन्न बना दिया है। जिसकी तस्दीक इससे भी होती है कि जब आजमगढ़ को आतंकवाद के बतौर बदनाम किया जाने लगा तब उसकी आड़ में संघ परिवार और भाजपा जो अब तक के अपने इतिहास में यहां सांकेतिक चुनाव ही लड़ती थी ने ‘‘इस्लामी आतंकवाद मुर्दाबाद, आजमगढ़ नहीं आर्यमगढ़ है, के साथ ही जय श्री राम, राम जन्म भूमि की जय, राम लला हम आएंगे मंदिर वहीं बनाएंगे के नारे खूब लगाए।’’ आज जबकी देश के दूसरे हिस्सों में संघ परिवार राम मंदिर के मुद्दे पर इस तरह के नारे लगाने की हैसियत और विश्वसनियता खो चुका है। वहीं पूर्वांचल में आजमगढ़ के बहाने फिर 92 के जिन्न की वापसी करायी जा रही है। मसलन अगर आजमगढ़ में ही देखें तो पूरा बेल्ट एक दौर में मंडल के बाद उभरे अस्मितावादी ‘संस्कृतिकरण’ की राजनीति का गढ़ रहा है और उस दौर में सांप्रदायिक राजनीति को यहां के पिछड़े-दलित तबके ने इस नारे के साथ खारिज कर दिया ‘मिले मुलायम कांसीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम।’ लेकिन आज हम साफ देख सकते हैं कि आतंकवाद के बहाने यहीं पर इन्हीं जातियों का एक बड़ा तबका वो सारे नारे लगा रहा है जिसे उसने 92 में खारिज कर दिया था।
दरअसल आज आजमगढ़ में संघ परिवार की राजनीति के लिए उसके इतिहास में सबसे बेहतर मौका है। मसलन 90 में यह गिरोह जहां काग्रेस, बसपा, सपा, कम्युनिस्टों और जनता दल जैसी पार्टियों पर उनके मुस्लिम परस्त होने की लानत देकर हिंदुओं को अपने साथ खड़ा करने की कोशिश कर रहा था जिसमें उनको इसलिए सफलता नहीं मिल पा रही थी क्योंकि पिछड़ी-दलित जातियों का संस्कृतिकरण अस्मितावादी चेहरे के साथ ही चल रहा था जिसमें उसकी राजनैतिक जरुरत अल्पसंख्यकों को अपने साथ जोड़कर रखना था। लेकिन आज मंडल की उपज इन जातियों के राजनीति का सांस्कृतिक तौर पर पूरी तरह से ब्राह्मणीकरण हो चुका है। जिसके चलते एक ओर जहां वे संघ परिवार से अपने फर्क को खत्म करके उसी की कतार में खड़े दिखने लगे वहीं मुस्लिमों में भी ये विचार मजबूत होने लगा कि इन पार्टियों और भाजपा में कोई अन्तर नहीं रह गया और अब हमें अपनी पहचान की राजनीकि को ही विकसित करना चाहिए। जिसकी परिणति बाटला हाउस के बाद सतह पर आए उलेमा काउंसिल में हुई है। ये ऐसी स्थिति है जो संघ परिवार को आजमगढ़ में पनपने के लिए 90 के उस दौर से भी ज्यादा स्पेस देती है। संघ परिवार, उलेमा काउंसिल की परछाई को उसके शरीर से भी बड़ा स्थापित कर अपना मुस्लिम जनाधार बढ़ाने मेंलगी है। हालांकि उलेमा काउंसिल की राजनीति में शुद्ध मुस्लिम पहचान की राजनीति का रुझान फिलहाल नहीं दिखता और वह अमरेष मिश्र जैसे इतिहासकार को लेकर चल रही है। जो एक दौर में अपने को वामपंथ के क्रांतिकारी धारा का सिपाही मानते थे।
जहां तक अण्डरवल्र्ड और आजमगढ़ के रिश्तों का सवाल है तो 93 के मुंबई धमाकों में अबूसलेम का नाम पहली बार आया। पर आजमगढ़ की इस छवि की स्वीकार्यता गुलशन कुमार की हत्या के बाद जादा बढ़ी। जिसके लिए भगवा ब्रिगेड ने जी तोड़ मेहनत की। गुलशन कुमार की धार्मिक छवि को हिन्दुत्व के साचे में ढाल कर इसे हिन्दुओं पर आक्रमण के बतौर प्रचारित किया गया। यहां गौर करने की बात है कि आजमगढ़ के जिन लोगों को इस हत्या का आरोपी बनाया गया उसमें हिंदुओं की संख्या बहुतायत थी और जिस ‘मेड इन बम्हौर’ लिखे कट्टे की जन्म स्थली आजमगढ़ में बम्हौर गांव है वहां पर इस व्यवसाय को भी पुलिस की मिलीभगत से हिंदू ही करते हैं। अबू सलेम के अब तक पकड़े गए गुर्गों में बहुतायत हिंदू है। ऐसे में अगर आजमगढ़ को समझना है तो इसे हिंदू-मुस्लिम के खाचंे में देखना निहायत नादानी होगी।
आज जब आतंकगढ़ के रुप में इसे स्थापित करते हुए कथित इण्डियन मुजाहिद्दीनों के जिले से इसे नवाजा जा रहा है तो ऐसे में एक घटना की तस्दीक अवश्य होनी चाहिए। पिछली सात सितंबर 08 को आजमगढ़ में योगी आदित्यनाथ के जबरन मुस्लिम मोहल्ले तकिया में घुस कर मुस्लिम विरोधी गालियां और मारपीट के बाद जो दंगा भड़का उसमें भगवा ब्रिगेड की गोली से मतीउल्ला की मौत हो गयी। इस बात को प्रशासन ने भी स्वीकारा की योगी के काफिले का वो रुट नहीं था। इस पूरे प्रायोजित दंगे में योगी के गुण्डों की संलिप्तता किसी से छिपी नहीं है पर उल्टे योगी ने खुद पर इसे आतंकी हमला बताया। सबसे महत्वपूण पहलू इसमें यह कि इस घटना पर इंडियन मुजाहिद्दीन ने ईमेल जारी कर बधाई भी दी थी। ऐसे में यह सवाल उठता है कि जिस रास्ते से योगी गए थे उस रास्ते से उनके जाने के बारे में या तो योगी जानते थे या फिर उनके समर्थक जानते थे। बाद प्रशासन ने भी बकायदा बयान देकर कहा की कोई आतंकी हमला नहीं था। ऐसे में मेल भेजने वाले और योगी के रिश्तों की जांच आवश्यक हो जाती है। वैसे योगी के लोग लंबे समय से आतंकी गतिविधियों में लिप्त पकड़े गए हैं। अभी पिछले साल ही पूर्व भाजपा सांसद और कथित संत राम विलास वेदांती जो एक टीवी चैनल के स्टिंग आपरेशन में काले धन को सफेद करने में पकड़े जा चुके हैं, को सिमी की तरफ से धमकी मिली थी। जिसके खिलाफ हिंदू युवा वाहिनी समेत पूरे भगवा कुनबे ने धरना प्रदर्शन शुरु कर दिया था। लेकिन जब पुलिस ने छान-बीन की तो इस पूरे प्रकरण के मास्टर माइंड स्थानीय हिंदू युवा वाहिनी के नेता ही निकले जो स्वयं धरने प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे थे। इस खुलासे के बाद वेदांती ने एफआइआर वापस ले लिया।
‘यूपी गुजरात बनेगा, आजमगढ़ इतिहास रचेगा’ के नारे लगाने वालों ने आजमगढ़ को आतंकगढ़ के रुप में स्थापित करने की कवायद तकरीबन 2000 में ही शुरु कर दी थी। 2000 में गणतंत्र दिवस पर शिब्ली नेशनल कालेज में वन्देमातरम को लेकर हुआ दंगा असफल होने के बाद इन संगठनों को काफी धक्का लगा पर इस दंगे से पूर्वांचल में सांप्रदायिकता का धुंआ दुबारा सुलगाने में इन संगठनों को काफी मदद मिली। जिसे बाद में योगी ने अपनी विस्तारवादी सोच के तहत उस युवा वर्ग को जो बेरोजगार है, समाज से कटा है, उसको मुख्यधारा में लाने के नाम पर अपने फासिस्ट हिंदू युवा वाहिनी जैसे अद्धसैनिक स्वरुपी जनसंगठनों में भर्ती किया। जो अपनी इस नयी पहचान से अपने को गौरवानवित महसूस कर रहा है। योगी आदित्यनाथ के जमीनी प्रयोग एक ऐसी नस्ल तैयार करने में लगे हैं जो विशुद्ध फासिस्ट हो, जिसका इतिहासबोध हद दर्जे तक मुस्लिम विरोधी मिथकों पर टिका हो और जो किसी भी तरह के गैर हिंदू प्रतीकों को बर्दाश्त न करता हो। जिसको हम उनके प्रयोग स्थलों पर साफ देख सकते हैं। शिब्ली नेशनल कालेज के छात्र नेता अजीत राय की व्यक्तिगत कारणों से की गयी हत्या के बाद 13 सितंबर 2004 को पहली बार, यूपी सरकार के पूर्वांचल के अपराधियों और माफियाओं की सूची मंे प्रथम स्थान को ‘सुशोभित’ करने वाले ‘योगी’ आदित्यनाथ ने आजमगढ़ को आतंकगढ़ कहते हुए हिन्दू गतिविधियों का केन्द्र बनाने की जो बात कही थी उसे हाल में आयी मालेगांव धमाकों की चार्जशीट चीख-चीख कर कह रही है कि गंगा के मैदानी भाग में जिस हिन्दू राष्ट् के लिए सशस्त्र संघर्ष की बात आयी है उसी आपरेशन का हिस्सा आजमगढ़ है। आज गांधी के हत्यारे उस शिब्ली नेशनल कालेज को इस्लामी आतंक की नर्सरी कह रहे हैं जिसके संस्थापक शिब्ली नोमानी ने गुलामी के उस दौर में नेशनल शब्द से इसे अलंकृत किया था जिस दौर में यह देशद्रोह समझा जाता था। जबकी खुद योगी के वैचारिक पूर्वजों की पूरे स्वतंत्रता संग्राम में कहीं कोई भूमिका नहीं दिखती, बल्कि उल्टे अंग्रजों के साथ उनके मिलीभगत के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं।
गौरतलब है कि योगी जिस पीठ के उत्तराधिकारी हैं वहां लंबे समय से उग्र हिंदुत्व खास कर सावरकर लाइन की पकड़ है। जहां माले गांव विस्फोटों में लिप्त अभिनव भारत की नेता और सावरकर की बहू और गांधी जी के हत्यारे गोडसे की बेटी हिमानी सावरकर का आना-जाना रहता है। दरअसल योगी का हिंदुत्व वादी एजेण्डा सावरकर और गोडसे की हिंदू महासभा की ही ब्लूप्रिंट है। जिसकी तस्दीक इस तथ्य से भी होती है कि गांधी जी की हत्या में प्रयुक्त रिवाल्वर इसी गोरक्षपीठ की थी। जिस मामले में तत्कालीन महंत दिग्विजय नाथ जो हिंदू महासभा के संस्थापक सदस्य थे उन्नीस महीने जेल में भी रहे। यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि योगी की कार्यशैली और उसके उद्देश्य पूरी तरह से मालेगांव अभियुक्तों के खिलाफ आयी चार्जशीट से मेल खाती है। जैसे पुरोहित, प्रज्ञा इत्यादि गंगा के मैदानी भाग में सशस्त्र हिंदू विद्रोह करना चाहते थे तो ठीक उसी तरह योगी भी इसी भू-भाग में जिसे वे पुण्यांचल कहते हैं सशत्र हिंदू प्रतिरोध की बात खुलेआम करते हैं।
दुनिया को ‘घुमक्ड़ी’ और ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’ की सीख देने वालों को आज एक सरहद में कैद कर दिया गया है। ‘जहां-जहां आदमी, वहां-वहां आजमी’ कहने वालों के स्वर धीमे हो गए हैं। हो भी क्यों न धमाके चाहे जहां भी हों मास्टर माइंड आजमगढ़ का ही होगा। आतंक और दहशत के इस माहौल में पुलिस की सांप्रदायिक कल्पनाशीलता को बड़ी आसानी से स्वीकार्यता हासिल हो चुकी है।
बहरहाल, आज अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर निर्णायक लड़ाई लड़ रहे आजमगढ़िए ‘लोकतंत्र’ की वो नींव है जिनकी शहादत पर हमारा कथित सेक्यूलर राष्ट्र राज्य अपना रुपांतरण एक फासिस्ट हिंदू राष्ट्र के बतौर कर रहा है।

5 टिप्‍पणियां:

anand ने कहा…

Bahut insightful,analytical aur hard hitting report hai...bilkul aankhen khol denewali....Aisi hi patrakarita ki jarurat hai aaj...badhai...

Mayank Rai ने कहा…

बधाई हो साथी यैसी बेबाक और साफ राय रखने के लिए. सवाल सिर्फ आजमगढ़ का नहीं है इस मुल्क का है ये अपने स्वार्थ के लिए एक नया आजमगढ़ रोज बनाते रहेगें

विनीत कुमार ने कहा…

जबरदस्त।...

Hassan ने कहा…

Ultimate... One of the best and hard hitting blogs i have ever read...

muskurahat ने कहा…

Bahut Barhia... Isi Tarah Likhte rahiye


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