13 नवंबर 2009

पुलिस को भारतीय न्यायव्यवस्था पर विश्वास नहीं


श्रीराम व जयराम चैधरी अपने चाचा के साथ 10 नवम्बर को सुबह से ही राबर्टसगंज के एक अस्पताल में बैठे थे। उनके चेहरे पर भय, आशका के भाव, दुख के उस विशद भाव से कहीं ज्यादा झलक रहे हैं जो एक पिता की मौत के बाद दिखाई देती है। वाराणसी के काशी विद्यापीठ में बीए द्वितीय वर्ष के छात्र 22 वर्शीय श्रीराम को 9 नवम्बर की शाम एक पत्रकार ने उनके मोबाइल पर उनके पिता कमलेश चैधरी के इंकाउन्टर की सूचना दी थी। तभी से उनका पूरा परिवार आतंकित है। उनका छोटा भाई जयराम राबर्टसगंज के पास दुद्धी में आई टी की पढ़ाई कर रहा है। वाराणसी से राबर्ट्गंज उन्हें पुलिसिया साये में लाया जाता है इस पर भी राबर्टसगंज कोतवाली में जांच व पूछताछ के नाम पर उन्हें तरह-तरह से प्रताड़ित व अपमानित किया जाता है। अब अस्पताल में वह अपने पिता की लाश की एक झलक पाने के इंतजार में सुबह से ही बैठा है। उनके पिता कमलेश चैधरी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने 8 नवम्बर को रोहतास से उठाकर 9 नवम्बर को सोनभद्र में चोपन के जंगलों में मार गिराया था। उनकी इस बहादुरी के लिए पुलिस प्रमुख एडीजी बृजलाल ने नकली मुठभेड़ में शामिल पुलिसकर्मियों को तमगों व आउट आॅफ टर्न प्रमोषन की घोशणा कर दी है।
श्रीराम व जयराम को 10 नवम्बर की शाम को उनके पिता की लाश के चेहरे की एक झलक दिखाई जाती है। श्रीराम बताते हैं कि पुलिस ने अपनी विभत्सता को ढकने के लिए यह भी नहीं देखने दिया की मेरे पिता को कहां-कहां गोली मारी गई थी। पुलिस उन पर बार-बार दबाव देती रही कि वह लाश का यहीं अंतिम संस्कार कर दें। लेकिन उनके साथ आए उनके गांव के सरपंच व परिवार वाले चाहते हैं कि कमलेश चैधरी का अंतिम संस्कार उनके गांव में हो। वहां पुलिस उन्हें लाश देने के आष्वासन के बाद दोनों को एक जीप में डाल कर अज्ञात स्थान की ओर ले जाती है। यह हिंदुवारी शमशान घाट था जहां पुलिस पहले से अंतिम संस्कार की सारी तैयारियां करके रखी हुई थी और दोनों बेटों के विरोध के बाद भी कमलेश चैधरी का अंतिम संस्कार वहीं कर पुलिस अपना पीछा छुड़ा लेती है। जब मुठभेड़ में शामिल पुलिसवाले आउट आॅफ टर्न प्रमोशन की खुषियां मना रहे थे, श्रीराम चैधरी अपने पिता की हत्या व उसके बाद पुलिस के आंतक को अपनी भीगीं आंखों के साथ पीयूसीएल के साथियों से साझा कर रहे थे। एक दिन पहले तक वह इतने आतंकित थे कि जब उनसे पीयूसीएल सोनभद्र के सचिव विकास शाक्य ने संपर्क किया तो उन्होंने कुछ भी बताने से साफ इंकार कर दिया। बाद में मीडिया व मानवाधिकार संगठनों ने जब खुद आगे आकर इस मुठभेड़ पर सवाल उठाया तो श्रीराम व जयराम का भी हौसला बढ़ा है। अब श्रीराम खुद कहते हैं कि उन्होंने मानवाधिकार आयोग, बिहार व उत्तर प्रदेश राज्य सरकार को पत्र लिखकर मुठभेड़ के जांच की मांग की है। वह कहते हैं कि अगर उनके पिता अपराधी थे तो पुलिस ने उन्हें पकड़ने के बाद कोर्ट में क्यों नहीं पेश किया? उन्हें सजा क्यों नहीं दिलाई गई। सरकार कहती हैं कि नक्सली कानून व्यवस्था बिगाड़ रहे हैं लेकिन पुलिस की इस कार्यवाही के बाद क्या यह माना जाए कि सरकार व पुलिस को भी भारतीय न्यायव्यवस्था में कोई विश्वाश नहीं।

1 टिप्पणी:

pratibha ने कहा…

kahan hain jawab dene wale? hai koi jawab?

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