14 नवंबर 2009

जनसंघर्ष और विप्लव के कवि मुक्तिबोध

रामायन राम


आज जब हिंदी के प्रगतिशील-जनवादी सोच के लेखकों को हम किसी भी सरकारी-गैर सरकारी पद-पुरस्कारों के लिए लपलपाते जीभ, तिकड़म करते और अपने इस कृत्य को जायज ठहराते हुए देखते हैं तो मुक्तिबोध का महत्व समझ में आता है। उनके लेखकीय व वैचारिक संघर्ष को नमन करने का मन होता है। आज साहित्य का जो परिदृश्य है, उसमें लेखकीय प्रतिबद्धता, सत्ता विरोध, जन पक्षधरता का लेखक के लिए जैसे कोई मूल्य नहीं है। यदि है भी तो आचरण में नहीं, मात्र लेखन तक। लेखक के लिए स्वयं अपने रचनात्मक मूल्यों को जीवन में उतारने की कोई बाध्यता या नैतिक जि मेदारी नहीं है। यह एक ऐसा चरम अवसरवादी समय है कि आप अपनी रचनाओं में जन पक्षधर हो सकते हैं, साथ ही अपने जीवन में मनुष्य विरोधी खेमे में आराम से खड़े रह सकते हैं। समाज में घृणा व विद्वेष पैदा करने वाले लोगों के आगे नतमस्तक होकर पुरस्कार तक ग्रहण कर सकते हैं।
मुक्तिबोध ने अपनी कविता अंधेरे मेंं में रात के अंधेरे में चलने वाले जुलूस की फैंटेसी के माध्यम से इन्हीं स्थितियों की ओर इशारा किया था। एक ऐसा फासिस्ट जुलूस जिसमें रात के अंधेरे में शहर के सफेदपोश कवि, साहित्यकार, डॉक्टर, वकील, पत्रकार, शहर के कु यात डोमाजी उस्ताद के साथ रहस्यमय अंदाज में चल रहे हैं। अंधेरे मेंं कविता में मुक्तिबोध की जो आशंकाएं (मुक्तिबोध ने कविता का शीर्षक पहले आशंका के द्वीप ज् अंधेरे में रखा था) थीं, वे आज विड बनाओं के रूप में हमारे सामने घटित हो रही हैं और हम उन्हें घटित होते देख रहे हैं।
मुक्तिबोध अपने समय में खड़े होकर भारत के अतीत, वर्तमान व भविष्य की समीक्षा करते नजर आते हैं। उनके सारे चिंतन व लेखन के मूल में है- कि सारे प्रश्न छलमय/और उत्तर भी छलमय/समस्या एक /अपने स य ग्रामों और नगरों में /सभी मानव सुखी, सुंदर व शोषण मुक्त कब होंगे। मुक्तिबोध ने भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में निहित समझौता परस्ती को बहुत ही सफाई से पकड़ा था और आजादी के बाद के भारत में नवसाम्राज्यवादी खतरे को वे तेजी से राष्ट्रीय जीवन की ओर आता हुआ देख रहे थे। यह मुक्तिबोध की कविता और उनकी रचनात्मक दृष्टि की महानता ही है कि लगभग आधी सदी पहले लिखी गई पंçक्तयां आज भारत के राष्ट्रीय जीवन पर कुछ इस प्रकार सही सिद्ध हो रही हैं, मानो वे कविता नहीं सटीक भविष्यवाणियां हों- साम्राज्यवादियों के बदशक्ल चेहरे /एटमिक धुएं के बादलों से गहरे/क्षितिज पर छाए हैं /साम्राज्यवादियों के पैसे की संस्कृति /भारतीय आकृति में बंधकर /दिल्ली को वाशिंगटन व लंदन का उपनगर बनाने पर तुली है/ भारतीय धनतंत्री /जनतंत्री-बुद्धिजीवी /स्वेच्छा से उसी का कुली है।ं निश्चय ही यह कालदर्शी दृष्टि मुक्तिबोध ने वादमुक्तता और अराजनीतिकरण के लिजलिजे आग्रह के चलते नहीं पाई थी। अपने लेखकीय और वैचारिक संघर्ष में मुक्तिबोध ने जनसंघर्षों से प्रेरणा ग्रहण की। माक्र्सवाद और क्रांति में उनकी गहरी आस्था थी। देश में चल रहे तमाम विप्लवकारी संघर्षों से उन्होंने वैचारिक ऊर्जा ग्रहण की थी।
मुçक्तबोध समग्रता में वर्ग संघर्ष के कवि हैं। यह वर्ग संघर्ष जितना बाह्य जगत में घटित होता है, उससे कहीं ज्यादा कवि के आ यंतर में घटित होता है। उल्लेखनीय है कि मुçक्तबोध की कविताओं में मध्यवर्ग की मौकापरस्ती और वैचारिक ढुलमुलपन की मुçक्तबोध ने अपनी कविताओं में खूब आलोचना की है। लेकिन इन सभी आलोचनाओं का प्रस्थान बिंदु खुद मुक्तिबोध रहे हैं- जितना ही तीव्र है द्वंद्व क्रियाओं-घटनाओं का /बाहरी दुनिया में /उतनी ही तेजी से /भीतरी दुनिया में चलता है द्वंद्व कि /फिक्र से फिक्र लगी हुई है।ं और, इसी फिक्र ने मुक्तिबोध को क्वकहीं का नहीं छोड़ां। इस फिक्र को लिए हुए मुक्तिबोध अपने जीवन काल में रचनात्मक संघर्ष व जीवन संघर्ष में बेहद अकेले पड़े रहे। मुक्तिबोध अपने भीतर संघर्ष में लगातार अपने अवसरवादी, सुविधाभोगी, यशस्वी प्रतिपक्ष को पटखनी देते रहे और विप्लव के एक वंचित, स्वाभिमानी और गरवीले गरीबं कवि के रूप में अपना जीवन जीते रहे।
मुक्तिबोध के रचनात्मक लेखन की राह सीधी सपाट नहीं है। उनकी राह दुर्गम पहाड़ों से होकर गुजरने वाली ऊबड़-खाबड़ पगडंडियों से बनती है। यही कारण है कि मुक्तिबोध का काव्य शिल्प आज बहुत लोगों को खटकता है और बहुत लोगों को आतंकित भी करता है। अपने विचारों व मनश्चित्रों को अभिव्यक्त करने के लिए उन्होंने फैंटेसी को कैनवस की तरह प्रयोग किया है। फैंटेसी के माध्यम से मुक्तिबोध हजारों सालों के भारतीय इतिहास व स यता की समीक्षा करते हैं- "हमारे भारत देश में /पुरानी हाय में से किस तरह से आग भभकेगी /उड़ेगी किस तरह भक से /हमारे वक्ष पर लेटी हुई विकराल चट्टानें /व उस पूरी क्रिया में से /उभरकर भव्य होंगे कौन मानव गुण।" बेशक मुक्तिबोध आधुनिक काल के सबसे बड़े हिंदी कवि और साहिçत्यक व्यçक्तत्व हैं।

(लेखक इलाहाबाद विवि के शोध छात्र और छात्र संगठन आइसा से जुडे़ हैं)

2 टिप्‍पणियां:

anurag shukla ने कहा…

ramayan bhai bahut bahdiya kuch logo mein abhi itna bodh hai ki muktibodh ko yaad kar lete hai
partner aapki politics ko badhai

pratibha ने कहा…

sundar! ati sundar!

अपना समय