10 दिसंबर 2009

मानवाधिकारों का एनकाउंटर

मानवाधिकार दिवस पर विशेष

ऋषि कुमार सिंह

भारत का संविधान हर लिहाज से मानवाधिकारों को संरक्षित करने में सक्षम है। बावजूद इसके राज्य प्रायोजित हिंसा में लगातार बढ़ोत्तरी होती जा रही है। नागरिकों को बिना कारण बताये हिरासत में लेने,गवाहों को धमकाने,फर्जी मुकदमों में फंसाने और एनकांउटर जैसे कई उदाहरण देश भर में फैले हैं। एक नहीं कई एनकाउंटर फर्जी साबित हुए हैं। फर्जी एनकाउंटर मानवाधिकारों उल्लंघन के मामलों में सबसे ज्यादा निंदनीय हैं,क्योंकि जीवन की रक्षा राज्य का पहला दायित्व है। अन्य अधिकारों की बात जिंदा रहने पर ही हो सकती है। बढ़ती मुठभेड़ (एनकाउंटर) की वारदातों और उसमें सत्यता की कमी को देखते हुए आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट का फैसला गौर करने लायक है। आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि अगर पुलिस के कर्तव्य निर्वाह के दौरान किसी भी तरह की मौत होती है,भले वह मुठभेड़ ही क्यों न हो,सम्बंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाये और इसकी निष्पक्ष जांच करायी जाये। हालांकि हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीमकोर्ट ने मार्च 2009 में रोक लगा दी है।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले से पहले दिसम्बर 2003 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस तरह के दिशा निर्देश जारी कर चुका है। जिसमें कहा गया है कि मुठभेड़ के बाद उसकी स्वतंत्र जांच एजेंसी से जांच अवश्य कराई जानी चाहिए। बावजूद कहीं आतंकवाद के नाम पर,कहीं अपराधियों से निटपने के नाम तो कहीं नक्सली या माओवादी होने के नाम पर मुठभेड़ों को अंजाम दिया जा रहा है। ताजा मामला उत्तर प्रदेश का है। जहां बिहार के रोहतास जिले से उठाये गये कमलेश चौधरी को उत्तर प्रदेश पुलिस ने सोनभद्र जिले के चोपन के जंगलों में मुठभेड़ में मार दिया । नक्सली हिंसा के आरोप में कमलेश चौधरी के साथ रोहतास से चार अन्य लोगों को उठाया गया था,जिन्हें मीडिया में खबर आ जाने के चलते पुलिस ने छोड़ दिया था। 9 नवम्बर 2009 को मुठभेड़ में मारे गये कमलेश चौधरी की लाश उनके बेटों श्रीराम और जयराम को 10 नवम्बर की शाम को सौंपी गई। मानवाधिकार संगठनों से अपनी पीड़ा बांटते हुए कमलेश चौधरी के बेटे श्रीराम का कहना है कि उसे अपने पिता का शरीर तक नहीं देखने दिया गया। यह भी नहीं पता चल सका कि कहां-कहां गोली मारी गई है। इसके अलावा पुलिस बार-बार जल्दी अंतिम संस्कार करने का दबाव दे रही थी। बेटों के विरोध के बावजूद पुलिस ने लाश को जीप में डालकर जबरदस्ती अंतिम संस्कार करा दिया,जबकि बेटे अपने पिता का अंतिम संस्कार गृह जिला रोहतास में करना चाहते थे। अंतिम संस्कार की सारा इंतजाम पुलिस ने ही किया था। बेटों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि अगर पुलिस ने पकड़ा था,तो कोर्ट में पेश करने के बजाय मार क्यों दिया ? यह मासूम सा सवाल सबके सामने है कि क्या नक्सली हिंसा या अन्य किसी अपराध से निपटने के लिए रचे गये व्यूह में लोगों की जान ले लेना कितना जायज है ? क्या राष्ट्रहित की परिभाषा में राज्य को हिंसा करने की छूट है ? अगर हिंसा नक्सली या अन्य समूहों की आलोचना का कारण है,तो इसे राज्य कैसे अपना सकता है ?

गौरतलब है कि कमलेश चौधरी के एनकाउंटर में शामिल पुलिस टीम को एडीजी (कानून-व्यवस्था) बृजलाल ने बहादुरी दिखाने के एवज में ‘आउट ऑफ टर्न’ प्रमोशन दिये जाने का एलान किया है। जिस तेजी से इनाम दिया गया,उसके आधार पर कहा जा सकता है कि नक्सली हिंसा में शामिल होने के आरोप में कमलेश चौधरी का फर्जी एनकाउंटर सिर्फ इनाम पाने के लिए ही किया गया था। क्योंकि जहां कमलेश चौधरी का अंतिम संस्कार हो रहा था,वहीं पुलिस वाले इनाम की खुशियां साझा कर रहे थे। उत्तर प्रदेश पुलिस उत्तरदायित्व मुक्त होकर स्वेच्छाचारिता और भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। सोनभद्र जिले में जो कुछ हुआ,उसका सीधा मकसद इस आदिवासी बाहुल्य इलाके को नक्सल प्रभावित दिखाने की साजिश है। ताकि नक्सली हिंसा से निपटने के नाम पर केंद्र और राज्य सरकार से जबरदस्त फंडिग कराई जा सके। सैन्य अधिकारियों द्वारा फर्जी मुठभेड़ की कहानी भी हमारे सामने है,जो मैडल पाने के लिए रची गई थी। देश के भीतर इस तरह के खेल को प्रवृत्ति के बतौर देखा जा सकता है। जिसमें किसी समस्या में अचानक उभार आने के संकेत दिये जाते हैं। फिर उसके खिलाफ लामबंदी और तैयारी के साथ छद्म युद्ध की घोषणा की जाती है। इससे सत्ताधारी को दोतरफा लाभ होते हैं। पहला,युद्धस्तरीय व्यवस्था बनाने के दौरान आर्थिक भ्रष्टाचार का मौका मिलता है। दूसरा,जनता को डराने और आसन्न खतरे से निपटने में सहयोग की अपील करते हुए तमाम जरूरी मुद्दों से ध्यान हटाने में मदद मिलती है।

इस पूरे मामले का चिंताजनक पहलू है कि उत्तर प्रदेश पुलिस अपना दामन बचाने के लिए कमलेश चौधरी मुठभेड़ मामले में आवाज उठाने वाले मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल और उसके कार्यकर्ताओं को एडीजी (कानून-व्यस्था) वृजलाल ने सीधे तौर पर धमकी दी और नक्सलियों से मिले होने का आरोप लगाया। जिसका मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने विरोध किया और मावनाधिकार आयोग से पूरे मसले पर हस्तक्षेप की मांग की। उत्तर प्रदेश में फर्जी मुठभेड़ों सच्चाई इससे पहले भी सामने आ चुकी है। मालूम हो कि उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग के आदेश के वावजूद एडीजी (कानून-व्यस्था) वृजलाल ने मुठभेड़ से जुड़ी सूचना का जवाब आज तक नहीं दिया है। इस सूचना आवेदन में पिछले कुछ सालों में हुई सभी मुठभेड़ों से जुड़े आंकड़े मांगे गये थे। जिसमें मुठभेड़ का समय,मारे गये व्यक्ति की आयु,नाम,पता और थाने का नाम जिसके अंतर्गत मुठभेड़ हुई थी,इत्यादि की जानकारी शामिल थी। फिलहाल पुलिस ने मुठभेड़ को डराने का हथकंडा बना लिया है। जिसके आधार पर कभी भी किसी को भी मार सकती है।

यह किसी एक राज्य की पुलिस की कहानी नहीं है,बल्कि पूरे देश में मानवाअधिकारों की हालत चिंताजनक है। इसके लिए राजनीति में नैतिकता की कमी सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। विपक्षविहीन राजनीतिक माहौल में जो लोग राज्य प्रायोजित अपराध के खिलाफ आवाज उठाते हैं,उन्हें डराया-धमकाया जा रहा है। गहराते संकट के बीच नागरिक संस्थाओं को इस बात की मांग तेजी से उठानी होगी कि आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को देश भर की मुठभेड़ों के संदर्भ में प्रयोग किया जाये,साथ-साथ मुठभेड़ की स्वतंत्र जांच का जिम्मा मानवाधिकार आयोग उठाये। आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही मुठभेड़ में शामिल अधिकारियों को हत्या के अपराध से मुक्त किये जाने की छूट हो। अगर जल्दी ही ऐसा कोई एहतिहाती कदम नहीं उठाया जाता है तो जिस तरह से सुरक्षा एजेंसियां बेलगाम होकर लोगों को मार रही हैं,उससे भारतीय लोकतंत्र के अवसादग्रस्त होने का खतरा बढ़ता जा रहा है।

ऋषि कुमार सिंह पीपुल्स यूनियन फॉर ह्युमन राइट्स(पीयूसीएल) से जुड़े हैं

2 टिप्‍पणियां:

Suman ने कहा…

nice

कौशल किशोर ने कहा…

Rajya prayojit hinsa ne hamare loktantra ke liye gambhir khatra paida kiya hai. Aaj aise kanoon banane ki disha me rashtriya surkcha ke nam par sarkar barh rahi hai usase bace khuche loktantrik adhikar aur simit ho jayenge. --Kaushal Kishor

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