23 नवंबर 2009

भारत में 'माओवाद' का उदय

अरिंदम सेन

(दूसरी किश्त)

हमारे देश में ब्रिटिश-विरोधी आतंकवादी/अराजकतावादी प्रवृत्ति रूस में ज़ारशाही-विरोधी ऎसी ही प्रवृत्ति की तरह ही कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना से काफ़ी पहले से ही अस्तित्व में रही आई। बाद में इनमें से ज़्यादातर ने भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी को अंगीकार किया। कम्यूनिस्ट आंदोलन के भीतर इस तरह की प्रवृत्तियों की पहली पहचानी जा सकने वाली बड़े पैमाने की अभिव्यक्ति भाकपा (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) आंदोलन को लगे झटके के बाद महादेव मुकर्जी, सेकेंड सी.सी. आदि धड़ों की शक्ल में उभरी। हालांकि मूल माओवादी धड़ा यानी माओवादी कम्यूनिस्ट सेंटर या एम.सी.सी. 'दक्षिण देश' नामक समूह (उसके द्वारा प्रकाशित पत्रिका से लिया गया नाम) से विकसित हुआ। कनाई चैटर्जी और अमूल्य सेन के नेतृत्व वाले इस धड़े के साथी सी.पी.एम. से बाहर आकर नक्सलबाड़ी विद्रोह के दौर में लड़ाकू किसान संघर्ष और दूसरी गतिविधियां संचालित कर रहे थे। उन्होंने भाकपा (मा.ले.) की सदस्यता ग्रहण नहीं की जिसका कारण था कामरेड चारू मजूमदार के साथ उनका गंभीर राजनीतिक मतभेद। वे भाकपा (मा.ले.) के निर्माण के विरोधस्वरूप भी उसके साथ नहीं आए क्योंकि उनके अनुसार पार्टी का निर्माण बगैर समुचित विचार-विमर्श के कर लिया गया था और उसके नेतृत्व में अक्षम लोगों को जगह दी गई थी। २० अक्टूबर, १९६९ में उन्होंने एम.सी.सी.की स्थापना की। धीरे धीरे और १९७० के दशक के आरम्भ में लगे झटकों के बाद उत्तरोत्तर तेज़ी से वे जंगली इलाकों में सैन्य दस्तों की गतिविधि के पक्ष में किसान संघर्ष छोड़ते गए। पश्चिम बंगाल से निकलकर वे अन्य इलाकों मुख्यत: अविभाजित बिहार राज्य के कुछ इलाकों में फैले। बाद में समान विचारों वाले कुछ अन्य धड़े जैसे कि २००३ में ' सेकेंड सी.सी. ' उनसे जुड़ते गए।

आज की माकपा (माओवादी) का दूसरा घटक था १९८० में कोंडापल्ळि सीतारमैया द्वारा स्थापित भाकपा(मा.ले.) पीपुल्स वार ग्रुप। एम.सी.सी. के ठीक विपरीत यह ग्रुप खुद को भकपा(मा.ले.) का ही बढ़ाव मानता था और मूल पार्टी के पुनरूद्धार और एकता के प्रति समर्पित था। इस संगठन ने ' रैयतु कुली संघम'( ग्रामीन गरीबों का संगठन),रैडिकल स्टूडेंट्स यूनियन आदि के झंडे तले ताकतवर जन-आंदोलनों के विकास के ज़रिए मज़बूत शुरुआत की। इस किस्म की पहलकदमी के चलते उसने व्यापक जनाधार और मज़बूत कैडर शक्ति का विकास किया। लेकिन जन-संगठन जल्दी ही अपनी ऊर्जा खो बैठे क्योंकि यह ग्रुप अधिकाधिक 'वाम दुस्साहसवाद' और संकीर्णतावाद की ओर झुकता गया। जैसा कि के. बालगोपाल ने बाद में लिखा कि दमन से मुकाबले के लिए उन्होंने सैन्य दस्तों को "अपनी गतिविधि का केंद्रबिंदु" बना डाला बजाय इसके कि वे " सरकार के गरीब-विरोधी रुख को बेनकाब करते हुए अपनी जन-कार्रवाइयों को एक ऎसे बिंदु तक विकसित करते जहां राजसत्ता प्राप्त करने की उनकी आकांक्षा को एक मज़बूत जनाधार प्राप्त हो पाता"। इसका एक नतीजा यह हुआ कि "जनता खुद ही दस्तों की कार्रवाइयों को न्याय के लिए अपने खुद के संघर्षों के स्थानापन्न के रूप में देखने लगी।.. इसके चलते एक ओर तो क्रांतिकारी स्वेच्छाचार के शिकार बने लोगों के रूप में उनके दुश्मनों की संख्या बढ़ती गई जितनी कि कभी भी जन-कार्रवाइ के कारण नहीं होती, वहीं दूसरी ओर इसने जनता को न्याय के लिए लड़ने वाली ताकत की बनिस्बत उसे (दूसरों केर हाथों) न्याय पाने वालों के रूप में पतित किया"। ( आंध्र प्रदेश में माओवादी आंदोलन, ई.पी.डब्लू., अंक २२, सन २००६, ज़ोर मेरा)

१९९३ के सितम्बर से एम.सी.सी., पी. डब्लू. जी. ऒर पार्टी यूनिटी ने अपने संघर्षों के समन्वय का निर्णय लिया। एकता के लिए त्रिकोणीय बातचीत एक लंबे और यातनादायी दौर के बाद शुरु हुई और कई बार आपस में खूनी झड़पों के चलते इसमें बाधा भी पड़ती रही। इन झड़पों में वह 'काला अध्याय' (जैसा कि उस दौर को इन संगठनों ने बाद में नाम दिया) भी शामिल था जिसमें एम.सी.सी और पी. डब्लू. जी. के कामरेडों ने दर्जनों की संख्या में एक दूसरे का गला काटा। १९९८ में भाकपा (मा.ले.) पार्टी यूनिटी का पी. डब्लू. जी. में विलय हो गया। सन २००० की जनवरी में विस्तारित पी. डब्लू. जी. ने माओत्से-तुंग विचार की जगह माओवाद को अपनाया ऒर इस परिवर्तन पर अगले साल पार्टी महाधिवेशन में मुहर लगाई गई। सन २००४ के सितम्बर में दोनों 'माओवादी' संगठनों का विलय हुआ ऒर भाकपा (माओवादी) की स्थापना हुई।

महासचिव का पद पी. डब्लू. जी. के कामरेड गणपति को गया और इस ग्रुप ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद के लेबल के साथ ही उस परंपरा के प्रति बची-खुची प्रतिब्द्धता को भी उतार फेंका। दोनों संगठनों के कैडरों को संतुष्ट करने की नीयत से बिलकुल सिद्धांतविहीन तरीके से चारू मजूमदार और कनाई चटर्जी , दोनों को इस नई पार्टी के संयुक्त संस्थापक के बतौर दर्शाया गया। ये दोनों नेता जिन्होंने अपने जीवन-काल में सचेत रूप से और मज़बूती के साथ एक ही पार्टी में एकताबद्ध होने से परहेज़ किया, मरणोपरांत अपने अनुयायियों द्वारा ऎसा करने को बाध्य किए गए। लेकिन नए संगठन की वैचारिक-राजनीतिक दिशा पर पूरी तरह एम.सी.सी. मार्का माओवाद का वर्चस्व हो गया। समान सोच वाली ताकतों के केंद्रीकरण की लम्बी प्रक्रिया से गुज़रने के बाद भाकपा (माओवादी) ने एक अकेली यात्रा की ओर कदम बढ़ाया जोकि उस रास्ते से अलग हट चुकी थी जोकि भाकपा (मा.ले.) का रास्ता था।

इस नए संगठन ने एक प्रेस विग्यप्ति में मौजूदा हथियारबंद दस्तों को जनमुक्ति सेना में और मौजूदा गुरिल्ला इलाकों को आधार इलाकों में रूपांतरित करने को अपने प्राथमिक और फ़ौरी कार्यभार के बतौर घोषित किया। लेकिन दुनिया ने देखा कि पहला कार्यभार जिसपर अमल उन्होंने शुरू किया, वह था आंध्र प्रदेश की कांग्रेस सरकार के साथ युद्धविराम, एक ऎसी कार्यनीति जो जल्दी ही उनपर उल्टी पड़ी। विडम्बना तो यह है कि जिस राजशेखर रेड्डी सरकार को भाकपा(माओवादी) ने तेलुगू देसम और भाजपा के खिलाफ़ एकतरफ़ा वोट बहिष्कार लागू करके और कांग्रेसी प्रतिनिधियों के पक्ष में प्रचार करके सत्तारूढ़ होने में मदद की, उसी के हाथों आंध्र प्रदेश में उसे अपने पुराने आधार के इलाकों को गंवाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने छत्तीसगढ़ के बस्तर और पश्चिम बंगाल के लालगढ़ जैसे इलाकों में अपनी गतिविधियों को केद्रित किया। (जारी)

पहली किश्त पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

1 टिप्पणी:

Suman ने कहा…

nice

अपना समय